रांची : झारखण्ड विधान सभा के अध्यक्ष रबीन्द्र नाथ महतो साउथ अफ्रीका के केपटाउन में आयोजित 69 वें राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन में भाग लेने के उपरांत अप० 2:15 बजे दिल्ली होते हुए रांची पहुंचे. अध्यक्ष डेलीगेट के रूप में तथा सदस्य मथुरा प्रसाद महतो, सदस्य दशरथ गागराई ऑब्जर्वर के रूप में इस सम्मेलन में भाग लेने हेतु 9 सितम्बर को रांची से रवाना हुए थे. अध्यक्ष डेलीगेट्स के रूप में सम्मेलन में अपने व्याख्यान देने के उपरांत रांची लौटे हैं जबकि ऑब्ज़र्वर 20 सितंबर को रांची लौटेंगे. अध्यक्ष सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में आयोजित वर्कशाप में भाग लेते हुए पार्लियामेंड एक्सेसबल और पार्यिलियामेंट लीडरशिप पर चर्चा की गयी. दुनिया भर से आए सांसद एवं विधान मंडलों के सदस्यों के समक्ष अपने व्याख्यान प्रस्तुत किये. अध्यक्ष रबीन्द्र नाथ महतो ने अपने वक्तव्य में कहा कि “दिव्यांगजन लोकतंत्र में केवल लाभार्थी नहीं,बल्कि नागरिक, मतदाता, प्रतिनिधि,नेता और निर्णयकर्ता हैं. (नीचे भी पढ़ें)
भारत में दिव्यांगजनों की लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए यूडीआइडी, सुगम्य भारत अभियान एवं निर्वाचन संबंधी सुविधाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने सुलभ संसद को समावेशी लोकतंत्र की आवश्यक शर्त बताया और झारखंड के वर्ष 2024 के निर्वाचन में विकलांग मतदाताओं के लिए घर में वोटिंग की सुविधा एवं मतदाताओं को पोलिंग बूथ तक वाहन से ले जाने की सुविधाओं जैसे प्रयासों का भी उल्लेख किया. उल्लेखनीय है कि झारखंड विधानसभा अध्यक्ष को सम्मेलन में वर्कशॉप के व्याख्यान के दौरान भारत की ओर से लीड स्पीकर की जवाबदेही दी गई थी तथा उनके सुझावों को नोटिस करते हुए अनुशंसित करने के लिए रिकॉर्ड में लिया गया. वहीं वर्कशाप पर अध्यक्ष ने अपने वक्तव्य में जलवायु अनुकूलन को केवल पर्यावरण का विषय न मानकर विकास, जनसुरक्षा और आजीविका की रक्षा से जोड़ने की आवश्यकता की बात कही तथा अनियमित वर्षा, जल संकट और बढ़ती गर्मी के मद्देनजर जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, पूर्व तैयारी एवं जलवायु-सहनीय आधारभूत संरचना पर बल दिया. उन्होंने इस विषय पर यह भी कहा कि सहनशीलता विकास में बाधा नहीं, बल्कि बेहतर और टिकाऊ विकास की आधारशिला है, हमारी संसदें केवल बहस के सदन नहीं, बल्कि तैयारी के सदन बनें ऐसा मेरा मानना है. (नीचे भी पढ़ें)
झारखण्ड की परिस्थितियों और चुनौतियों को सामने रखते हुए माननीय अध्यक्ष ने राज्य के वन, जल, कृषि, खनिज संसाधन और झारखंड के आदिवासी समुदायों की आजीविका के आपसी संबंधों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था दृष्टिकोण से समन्वय स्थापित करने तथा स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप जलवायु अनुकूलन की रणनीति विकसित करने पर बल दिया और इसी अनुरूप कानून, बजट, निगरानी और प्रभावी प्रतिनिधित्व के माध्यम से इन प्रयासों को सशक्त बनाने की आवश्यकता बताया. अध्यक्ष ने सम्मेलन के आयोजन पर विचार रखते हुए यह भी कहा कि राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन ने विभिन्न देशों और विधानमंडलों के प्रतिनिधियों के संसदीय अनुभवों, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और जनहित से जुड़े समसामयिक विषयों पर विचारों के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया है. सम्मेलन में झारखण्ड राष्ट्रमंडल संसदीय संघ शाखा की भागीदारी के माध्यम से यहाँ के डेलिगेशन के अनुभवों और प्राथमिकताओं को वैश्विक संसदीय विमर्श से जुड़ने का अवसर मिला. इस सम्मेलन में प्राप्त अनुभवों, विचारों और श्रेष्ठ संसदीय कार्यप्रणालियों को झारखण्ड विधान सभा की कार्यप्रणाली में शामिल करते हुए सदन की कार्यवाही को और अधिक प्रभावी, समावेशी एवं जनोन्मुख बनाने का प्रयास किया जाएगा.




