जमशेदपुर : दिव्यांगजनों (पीडब्ल्यूडी) के लिए समावेशी शिक्षा और समान अवसरों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को और मजबूत करते हुए, टाटा स्टील फाउंडेशन ने अपने प्रमुख दिव्यांगता समावेशन कार्यक्रम सबल के माध्यम से पश्चिमी सिंहभूम जिले के ग्रामीण प्रखंडों के 12 बधिर विद्यार्थियों के जमशेदपुर स्थित कारमेल बाल विहार (सीबीवी) में दाखिले और आवासीय सुविधा की व्यवस्था की है. यह पहल टाटा स्टील और निप्पन स्टील की संयुक्त उपक्रम जेसीएपीसीपीएल समर्थित बधिर समावेशन परियोजना के तहत की गई है. यह सबल के तहत इस तरह की पहली पहल है, जिसका उद्देश्य जनजातीय और ग्रामीण समुदायों के बधिर बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, संचार संबंधी सहायता और सीखने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराकर उनके सामने मौजूद शैक्षणिक अंतर को कम करना है. सबल, टाटा स्टील फाउंडेशन की प्रमुख दिव्यांगता समावेशन पहल है, जिसका उद्देश्य दिव्यांगजनों के लिए सुगम्यता, शिक्षा, आजीविका के अवसर, सहायक सहयोग और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देना है. सामुदायिक स्तर पर किए जाने वाले हस्तक्षेपों, भारतीय सांकेतिक भाषा (आइएसएल) प्रशिक्षण, डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों, कौशल विकास और जागरूकता एवं समर्थन संबंधी प्रयासों के माध्यम से सबल एक ऐसे समानतापूर्ण समाज के निर्माण की दिशा में काम करता है, जहाँ दिव्यांगजन गरिमा, आत्मनिर्भरता और समान अवसरों के साथ जीवन जी सकें. चयनित विद्यार्थी आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से ताल्लुक रखते हैं और सुनने एवं बोलने संबंधी दिव्यांगता के कारण औपचारिक शिक्षा तक पहुंच बनाने में उन्हें काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है. इनमें से कई विद्यार्थी आइएसएल प्रशिक्षण, कंप्यूटर शिक्षा और अन्य विकासात्मक पहलों के माध्यम से सबल से जुड़े रहे हैं. इन पहलों ने उनकी संचार क्षमता, आत्मविश्वास और सीखने की तैयारी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. (नीचे भी पढ़ें)
सोनारी के कारमेल बाल विहार में दाखिले के माध्यम से विद्यार्थियों को औपचारिक स्कूली शिक्षा, आवासीय देखभाल, व्यवस्थित संचार सहयोग और समग्र विकास के अवसर प्राप्त होंगे. इस पहल से उनके शैक्षणिक विकास, सामाजिक समावेशन, आत्मनिर्भरता और भविष्य में आजीविका के अवसरों में उल्लेखनीय सुधार होने की उम्मीद है. इस पहल का प्रभाव बच्चों की अपनी कहानियों में भी दिखाई देता है. कुटीनाटा गांव के 14 वर्षीय सोनाराम तिरिया को सुनने और बोलने संबंधी 88 फीसदी दिव्यांगता है. वह सीमित साधनों वाले एक किसान परिवार से आते हैं. वर्ष 2022 से सबल से जुड़े सोनाराम ने आइएसएल और कंप्यूटर प्रशिक्षण कार्यक्रमों का लाभ उठाया है, जिससे उन्हें संचार और डिजिटल कौशल विकसित करने में मदद मिली है. कारमेल बाल विहार में उनका दाखिला बेहतर शैक्षणिक अवसरों और भविष्य में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. सूरज मुंडा के लिए यह सफर विशेष रूप से प्रेरणादायक रहा है. जन्म से ही गंभीर सुनने संबंधी दिव्यांगता के साथ जीवन की शुरुआत करने वाले सूरज को माता-पिता की देखभाल से अलग होने के बाद बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. बाद में उन्हें ऐसी स्थिति से बचाया गया, जहां उन्हें भीख मांगने के लिए मजबूर किया गया था. (नीचे भी पढ़ें)
बाल संरक्षण व्यवस्था के सहयोग से और इसके बाद टाटा स्टील फाउंडेशन की दिव्यांगता समावेशन पहल से जुड़कर उन्होंने अनेक चुनौतियों के बावजूद अपनी शिक्षा जारी रखी. इसी तरह, जगन्नाथपुर प्रखंड के रामसिंह हेस्सा (12), जो 100 फीसदी सुनने और बोलने में अक्षम हैं, ने कम उम्र में ही अपने पिता को खो दिया. उनकी मां ने उनका पालन-पोषण किया और सब्जी की खेती तथा कृषि कार्य के माध्यम से परिवार का भरण-पोषण किया. सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद रामसिंह ने अपनी पढ़ाई जारी रखी. सबल के आइएसएल और कंप्यूटर प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से उनमें आत्मविश्वास और संवाद कौशल का विकास हुआ, जिसके बाद इस पहल के तहत उनका चयन किया गया. एक अन्य छात्र, नोआमुंडी प्रखंड के कृष्णा चाम्पिया (13), जिन्हें 92 फीसदी से अधिक सुनने में कठिनाई है, दिहाड़ी मजदूर परिवार से आते हैं. मुख्यधारा के स्कूल में पढ़ाई के दौरान संवाद में आने वाली बाधाओं के बावजूद कृष्णा सीखने के प्रति समर्पित रहे और सबल के तहत आइएसएल, कंप्यूटर और क्ले आर्ट प्रशिक्षण में सक्रिय रूप से भाग लिया. कारमेल बाल विहार में उनका दाखिला उनके परिवार के लिए नई उम्मीद लेकर आया है. उनका परिवार शिक्षा को अधिक आत्मनिर्भर और सम्मानजनक भविष्य की राह मानता है. ये कहानियां कार्यक्रम के तहत चयनित सभी 12 छात्रों की आकांक्षाओं को दर्शाती हैं. पश्चिमी सिंहभूम के सुदूर आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले इन बच्चों ने गरीबी, संवाद संबंधी चुनौतियों और विशेष शैक्षणिक सहयोग तक सीमित पहुंच जैसी कई बाधाओं को पार किया है. (नीचे भी पढ़ें)
कारमेल बाल विहार में उनका दाखिला यह सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है कि दिव्यांगता शिक्षा और अवसरों की राह में बाधा न बने. अपने विचार साझा करते हुए कारमेल बाल विहार स्कूल की प्राचार्या सिस्टर अमिका एसी ने कहा कि शिक्षा सफलता की कुंजी है. सही सहयोग और समर्थन मिलने पर सुनने में अक्षम व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं और आजीविका के बेहतर अवसरों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित हो सकती है. अपने विचार साझा करते हुए, स्किल डेवलपमेंट, डिसेबिलिटी एंड स्पोर्ट्स के हेड कैप्टन अमिताभ ने कहा कि शिक्षा में जीवन को बदलने की शक्ति है और हर बच्चे को सीखने, आगे बढ़ने और अपनी क्षमताओं को विकसित करने का समान अवसर मिलना चाहिए. इस पहल के माध्यम से हम यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि वंचित समुदायों के सुनने में असमर्थ बच्चे पीछे न रह जाएं और उन्हें अपनी पूरी क्षमता को साकार करने के लिए आवश्यक सहयोग और अवसर मिलें. यह कार्यक्रम टाटा स्टील फाउंडेशन के उस व्यापक विजन को दर्शाता है, जिसमें एक समावेशी समाज के निर्माण की परिकल्पना की गई है, जहां दिव्यांगता शिक्षा, सहभागिता या अवसरों की राह में बाधा न बने. विशेष शैक्षणिक संस्थानों और सहयोग प्रणालियों तक पहुंच सुनिश्चित करते हुए, फाउंडेशन दिव्यांग बच्चों के लिए सम्मानजनक, आत्मनिर्भर और सार्थक जीवन की राह को लगातार मजबूत कर रहा है.




