नई दिल्ली : अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ ) ने जीडीपी कैल्कुलेशन के भारत के बदले तरीके का स्वागत किया है. आइएमएफ का कहना है कि यह तरीका बेहतर सांख्यिकीय प्रथाओं और ग्लोबल संस्था की ओर से दी गई सलाह की तर्ज पर है. आइएमएफ के एशिया प्रशांत विभाग के डायरेक्टर कृष्णा श्रीनिवासन ने इस बदलाव को स्वागत योग्य कदम बताया. उन्होंने कहा कि यह नया तरीका आइएमएफ के सांख्यिकी विभाग के सुझावों के अनुरूप है. श्रीनिवासन ने गुरुवार को कहा, ‘तरीके में किए गए ये बदलाव पूरी तरह से हमारी सलाह के अनुरूप हैं. इसमें हमारे सांख्यिकी विभाग की ओर से दी गई सलाह भी शामिल है.’ (नीचे भी पढ़ें)
श्रीनिवासन ने यह भी बताया कि भारत ने जीडीपी कैल्कुलेशन प्रोसेस में किए गए बदलावों को साफ करते हुए एक नोट जारी किया है. उन्होंने माना कि सांख्यिकीय तरीकों में हमेशा सुधार की गुंजाइश रहती है, लेकिन, साथ ही उन्होंने जीडीपी आंकड़ों को मजबूत करने के लिए सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआइ) के किए गए कामों की तारीफ की. तरीके के बारे में बात करते हुए डायरेक्टर ने कहा, ‘जीडीपी आंकड़ों के मामले में उन्होंने जो किया है वह अच्छी प्रथाओं के अनुरूप है. मैं कहूंगा कि सुधार की हमेशा गुंजाइश होती है, लेकिन हमें जीडीपी आंकड़ों को बेहतर बनाने के लिए एमओएसपीआइ के अच्छे काम को जरूर मानना चाहिए.’ (नीचे भी पढ़ें)
बताते चलें कि यह प्रतिक्रिया तब आई है जब आइएमएफ ने 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को जुलाई में बताए गए 6.4% से बढ़ाकर 7% कर दिया है. अपनी प्रमुख रिपोर्ट ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक’ में आइएमएफ ने इस बढ़ोतरी का कारण उम्मीद से बेहतर आर्थिक रफ्तार, मजबूत घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र में जोरदार गतिविधियों को बताया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन अर्थव्यवस्थाओं के विकास अनुमानों में बढ़ोतरी की गई है, उनमें भारत सबसे आगे है. यह देश की निरंतर आर्थिक रफ्तार और मजबूत विकास क्षमता को दिखाता है. इसे अनुकूल जनसांख्यिकीय स्थिति, बढ़ते घरेलू बाजार और लगातार हो रहे संरचनात्मक सुधारों का समर्थन हासिल है. (नीचे भी पढ़ें)
यह संशोधित अनुमान भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की हालिया मौद्रिक नीति बैठक के बाद आया है. बैठक में आरबीआइ ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को बढ़ाकर 7.1% कर दिया था. आइएमएफ ने 2027-28 के लिए भी भारत की विकास दर के अनुमान को 0.3 फीसदी बढ़ाकर 7% कर दिया है. इसका कारण देश के आर्थिक विस्तार की निरंतरता को बताया गया है. श्रीनिवासन ने ऊर्जा संकट के बाद भारत की विनिमय दर पर पड़े दबाव का जिक्र करते हुए कहा कि देश ने मजबूत आर्थिक आधार के दम पर इस व्यवधान का सामना किया. बहुत अच्छे से प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि विनिमय दर में होने वाले बदलाव कई बाहरी कारकों से प्रभावित होते हैं, न कि ये सीधे तौर पर घरेलू आर्थिक प्रदर्शन को दिखाते हैं. (नीचे भी पढ़ें)
उन्होंने कहा कि विनिमय दर वैश्विक ब्याज दरों, निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता और तेल की कीमतों पर निर्भर करती है. उन्होंने कहा कि करेंसी पर दबाव का मतलब यह नहीं है कि आर्थिक विकास से कोई वास्तविक संबंध टूट गया है. बता दें कि विगत माह, जब सरकार ने जून तिमाही के लिए 7.8 फीसदी की विकास दर (जो उम्मीद से कहीं अधिक थी) की रिपोर्ट दी तो भारत की जीडीपी गणना के तरीके पर सवाल उठाए गए थे.





