संतोष कुमार की रिपोर्ट

जमशेदपुर : खुले आसमान के नीचे रात काट रहे इन लोगों को जरा गौर से देखिए…… ऊपरवाले ने इनकी किस्मत में शायद यही लिखकर भेजा है… वैसे ये बदलते भारत और उन्नत झारखंड की उन्नति की गाथा है. वैसे इसे आप सबका साथ…. सबका विकास और राइजिंग झारखंड की जमीनी हकीकत भी कह सकते हैं. गरीब होते ही हैं राजनीति के लिए इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है. कि आज भी देश के ज्यादातर लोगों के पास रात काटने के लिए छत नहीं है….. वैसे ये नजारा आप जो देख रहे हैं यह झारखंड की औद्योगिक राजधानी और जमशेदजी नसेरवानजी टाटा के सपनों का शहर जमशेदपुर का है.. ये वही जमशेदपुर है जिसे टाटा साहब ने बसाया था. मजदूरों का शहर…. मजलूमों का शहर…. आम लोगों का शहर….. क्या वाकई में आज यह शहर आम लोगों का रह गया है ? वैसे सरकार की अगर हम बात करें तो बीते 20 सालों में झारखंड ने राजनीतिक बदलाव के कई रूप देखे हैं… सरकारें आई गई, लेकिन गरीब जहां था आज भी वहीं खड़ा है.

वैसे बिना छत के खुले आसमान में रहने वाले लोगों के लिए सरकार ने आश्रय गृह का निर्माण जरूर कराया, लेकिन शहर हो या गांव आश्रय गृह हाथी का दांत ही साबित हो रहा है. लाखों रुपए की लागत से बने इन आश्रय गृहों में गरीबों के लिए ताला लटका हुआ है. यही कारण है कि गरीब आज भी खुले आसमान में छत के नीचे सोने को विवश है. जमशेदपुर के अलग-अलग इलाकों में बने आश्रय गृहों में ताले लटके होने के सवाल पर ना तो जिला प्रशासन और ना ही अक्षेस के पदाधिकारी कुछ भी बोलने को तैयार हैं. हां आश्चर्य ग्रहों का ख्याल जिला प्रशासन और निकायों को उस वक्त आता है जब शहर में कड़ाके की ठंड पड़ती है, लेकिन आम दिनों में इन आश्रय गृहों में ताले ही लटके नजर आएंगे. आपको बता दें कि जमशेदपुर में तीनों शहरी निकाय क्षेत्र मिलाकर लगभग आधा दर्जन आश्रय गृह है, लेकिन इन आश्रय गृहों में ताले लटके नजर आते हैं. वैसे सरकार ने दावा किया था कि सभी आश्रय गृहों में सुरक्षाकर्मी और कर्मचारी की नियुक्ति होगी, लेकिन ना सुरक्षा कर्मियों की नियुक्ति हुई और ना ही कर्मचारियों की. नतीजा सभी आश्रय गृहों में ताले लटके हुए हैं. वैसे बाहर से आने वाले लोगों से इन आश्रय गृहों में रात बिताने के एवज में वसूली की भी बात सामने आ रही है.

एक ट्रक चालक ने बताया कि आश्रय गृह में रहने के एवज में रात के 50 रुपये और दिन के 50 रुपए यानी दोनों वक्त मिलाकर 100 रुपए चुकाने पड़ते हैं, जबकि अक्षेस के एक अधिकारी का कहना है, कि शहर के आश्रय गृह ठीक-ठाक चल रहे हैं कहीं-कहीं मरम्मत की आवश्यकता है, जिसे करा दिया जाएगा, लेकिन पैसे लिए जाने की बात से उन्होंने साफ इनकार करते हुए कहा अगर ऐसी बात है तो जांच कराई जाएगी, दोषी पाए जाने पर कार्रवाई भी की जाएगी. अब सवाल ये उठता है कि आखिर शहर के आश्रय गृहों के इस दुर्दशा और अव्यवस्था के लिए जिम्मेवार कौन है ? और क्यों गरीबों के लिए इनके दरवाजों में ताले लटके है.






