जादूगोड़ा : नेताजी सुभाष चन्द बोस की जयन्ती शुक्रवार, 23 जनवरी को पूरे देश में मनाई जाएगी, लेकिन जादूगोड़ा से सटे कालिकापुर गांव में उनकी जयंती को लेकर खासा उत्साह है. इस गांव के लिए नेताजी सुभाषचंद्र बोस और उनकी जयंती खास मायने रखती है. आजादी की लड़ाई के दौरान नेताजी 5 दिसंबर, 1939 को कालिकापुर गांव पहुंचे थे और यहां एक सभा को भी संबोधित किया था. गांव के निवासी समाजसेवी डॉ विकासचंद्र भक्त के परिवार ने उस कुर्सी को आज तक सुरक्षित बचाकर रखा है, जिस पर उस दिन नेताजी बैठे थे. (नीचे भी पढ़ें)

यह दुर्भाग्य की बात है कि आजादी के इतिहास में कालिकापुर गांव आज भी अपना समुचित स्थान पाने से वंचित है. यहां के कुम्हारों के नेतृत्व में अंग्रेजी शासन के दमन के खिलाफ किए गये आंदोलन के तहत कालिकापुर थाना में तोड़फोड़ व तत्कालीन दारोगा काली प्रसाद की पिटाई व इस घटना के बाद देश की आजादी में मुख्य भूमिका निभानेवाले नेताजी सुभाषचंद्र बोस का कालिकापुर आकर जनसभा को संबोधित करना आज भी गांव के लोगों की जुबान पर है. देश की आजादी के आंदोलन में कालिकापुर के नेतृत्वकर्ता ईशान चंद्र भक्त के पौत्र डॉ विकास चंद्र भकत ने अपने दादाजी से सुनी तत्कालीन घटना की जानकारी देते हुए बताया कि 1934 से पूर्व कालिकापुर गांव में अंग्रेजों ने थाना बनवाया था. 1934 में इस थाना में दारोगा के पद पर काली प्रसाद कार्यरत थे, जिनकी दमनकारी नीति से इस क्षेत्र के लोग काफी त्रस्त थे. उस दौरान पूरे भारत में अंगरेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था. 1934 में कालिकापुर के आंदोलनकारी प्रमुख नेता व मुखिया रहे स्व ईशान चंद्र भक्त के आवास के समीप प्रधान चौक में स्थानीय ग्रामीणों की एक बैठक हुई. बैठक में कालिकापुर के तत्कालीन दारोगा काली प्रसाद के दमन व अत्याचार के खिलाफ आंदोलन करने का निर्णय लिया गया, लेकिन उस बैठक में भाग ले रहे कुछ बुजूर्गों ने ‘कल करे सो आज कर, आज करे से अब’ की नीति पर चलने की बात कही. उन्होंने कहा कि क्यों न अभी तुरत थाना पर आक्रमण किया जाये. इस पर सभी ग्रामवासियों ने उग्र होकर थाना पर आक्रमण कर दिया एवं थाना परिसर में ही तत्कालीन दारोगा काली प्रसाद की पिटाई कर दी और थाना में तोड़फोड़ की. सबसे पहले हरिचरण भक्त ने दारोगा की पिटाई की थी व गांव में आक्रोश इतना था कि एक दृष्टिहीन बुजुर्ग संजय भकत ने भी लोगों की मदद से दारोगा तक पहुंचकर उसकी पिटाई कर दी. इस घटना के बाद तत्कालीन दारोगा काली प्रसाद थाना छोड़कर भाग गया. इसके बाद कालिकापुर से थाना हटाकर पोटका में नया थाना बनाया गया. उस समय सूचना तंत्र की समुचित सुविधा नहीं रहने के कारण इस घटना की खबर अन्य जगहों पर पहुंचने में काफी देर हुई. इस घटना की खबर जब स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाषचंद्र बोस को मिली, तो उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एक संगठन बनाने के वास्ते कालिकापुर आने की इच्छा जाहिर की. वहीं इस क्षेत्र के कांग्रेस से जुड़े स्वतंत्रता आंदोलनकारियों ने भी नेताजी को आने का न्योता दिया, जिसे नेताजी ने स्वीकार कर लिया. (नीचे भी पढ़ें)
नेताजी के आने की तिथि निश्चित होते ही कालिकापुर के तत्कालीन कांग्रेस से जुड़े नेता एवं आसपास के क्षेत्रों के नेताओं ने पोटका क्षेत्र के विभिन्न गांवों में ढोल-नगाड़ा बजवाकर 5 दिसंबर 1939 को नेताजी के आने की सूचना लोगों के घर-घर तक पहुंचाई. सूचना के बाद सिंहभूम के तमाम ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों में एक नये उत्साह का संचार हुआ और वे नेताजी को देखने व सुनने के लिए उतावला हो उठे. (नीचे भी पढ़ें)

5 दिसंबर 1939 को कड़ाके की ठंड होने के बावजूद हजारों की संख्या में लोग नेताजी के स्वागत के लिए सज-धज कर तैयार रहे. नेताजी के जमशेदपुर से सड़क मार्ग से हाता होते हुए कालिकापुर आने की सूचना निर्धारित थी, इसलिए नेताजी के स्वागत के लिए लोगों की भीड़ कालिकापुर से सवा किमी पश्चिम में सड़क मार्ग के किनारे खचाखच भर गया था. स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस प्रातः लगभग दस बजे जमशेदपुर के डिकोस्टा साहब की फोर्ड कार से कालिकापुर पहुंचे, पहुंचने के बाद लोगों में दुगुना उत्साह बढ़ा और ‘वंदे ‘मातरम’ की आवाज से पूरा इलाका गुंजायमान हो उठा. स्वागत के लिए सड़क के दोनों किनारे खड़े महिला-पुरुष एवं बच्चों ने नेताजी पर फूल बरसाए और शंख की ध्वनि से महिलाओं ने वातावरण गुंजायमान किया. इस दौरान महिलाओं ने पारंपरिक रीति से पैर धुलाकर उनका स्वागत किया. स्व ईशान चंद्र भकत एवं विशिष्ट ग्रामीण आदर-सत्कार के साथ नेताजी को सभा स्थल तक ले गए. सभा स्थल में सर्व प्रथम बालिपोश गांव के ब्राह्मण शिवराम पंडा ने उन्हें फूल-चंदन लगाया एवं कालिकापुर पंचायत अंतर्गत मातकमडीह के सरदार महेश्वर भकत की दस वर्षीय कनिष्ठ भतीजी चंद्र मुखी भकत ने नेताजी को माला पहनाया. इस सभा की अध्यक्षता ईशान चंद्र भकत एवं संचालन तत्कालीन शिक्षाविद् एवं जाने-माने कविराज कमल लोचन भक्त ने किया. (नीचे भी पढ़ें)

स्व ईशान चंद्र भक्त के पौत्र डॉ विकास चंद्र भक्त ने अपने दादाजी द्वारा बताये गये नेताजी सुभाष चंद्र के भाषण को दोहराते हुए कहते हैं कि नेताजी ने यहां लगभग दो घंटे तक लगातार बांग्ला भाषा में लोगों को संबोधित किया. इस दौरान नेताजी ने कहा था कि भारत वर्ष में अभी अंग्रेजों का शासन चल रहा है. वे अपने इस शासन के दौरान भारत के लोगों पर दमन की नीति अपना रहे हैं. भारत वर्ष गुलामी की जंजीरों में जकड़ा है. इस जंजीर को देश प्रेमी ही तोड़ सकते हैं. नेताजी ने कहा था कि कालिकापुर के वासियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ यहां की थाना पुलिस की दमनकारी नीति के खिलाफ जो कदम उठाया गया है, उससे ऐसा लगता है कि यहां की जनता में आंदोलन के प्रति काफी उत्साह व उमंग है. इस सभा में प्रमुख रूप से विशिष्ट लोगों में के डिकोस्टा साहब, हरिचरण भक्त, शिवचरण भक्त, परेश भक्त (गोपालपुर के स्वाधीनता सेनानी), शशधर भक्त, सत्यानंद भक्त, स्वांसपुर ग्राम के ग्राम प्रधान लखी चरण भक्त, शिवचरण भक्त, सरदार महेश्वर भक्त (मातकमडीह), अतुल कृष्ण दत्ता, शिवराम पंडा तथा आसनबनी के स्वतंत्रता सेनानी स्व महतो, रूहिदास केशव, केशव भक्त, संजय भक्त, नीलमोहन भक्त, शिशिर कुमार भक्त, पूर्णचंद्र मंडल, चंद्र मोहन भक्त सहित लोगों ने महासभा के इस कार्यक्रम को सफल बनाया था, जिनमें अभी कोई भी व्यक्ति जीवित नहीं है. (नीचे भी पढ़ें)

इस सभा के बाद नेताजी अपराह्न 1.30 बजे डिकोस्टा साहब की फोर्ड कार से ही हिस्दुस्तान कॉपर के मजदूरों द्वारा आयोजित जनसभा को संबोधित करने के लिए घाटशिला रवाना हो गये. जहां उन्होंने लगभग आधा घंटा भाषण दिया. इसके बाद नेताजी ने चाकुलिया में आयोजित जनसभा को संबोधित किया, जहां से वे शाम की ट्रेन से कोलकाता की ओर रवाना हो गये.1939 की सभा के दौरान नेताजी जिस कुर्सी पर बैठे थे व उनके सामने रखा गया टेबल व टेबलक्लोथ आज भी स्व ईशान चंद्र भक्त का परिवार घरोहर के रूप में संजोकर रखे हुआ है, जो सुभाष चंद्र बोस की याद को ताजा करता है. ईशान चंद्र भक्त के सात भाई थे – हरिचरण भक्त, कमल लोचन भक्त, लखी चरण भक्त, शिवचरण भक्त, उद्धव भक्त, रामचंद्र भक्त इनके पिता का नाम स्व राखाल चंद्र भक्त था, जिनकी जमीन पर राखा कॉपर, राखा स्टेशन बनाया गया है, वहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस की स्मृति में सरकार के अनुदान से 1934 में नेताजी के सभा स्थल पर एक सभा भवन एवं नेताजी की 100वीं जयंती के अवसर पर 1996 में कालिकापुर के ग्रामीणों द्वारा नेताजी सुभाष चंद्र उच्च विद्यालय की स्थापना की गई है, जहां आज भी बच्चे पढ़ रहे हैं.



