गालूडीह : अयोध्या में श्री राम के जन्म के बाद से ही भगवान शंकर को उनके दर्शन की अभिलाषा थी, किंतु कोई अवसर ही नहीं मिल रहा था. भगवान शिव का हृदय श्रीराम के दर्शनों के लिए व्याकुल हो रहा था. उन्हें लगता था कि यदि उन्होंने दर्शन नहीं किये तो बाद में पछतावा ही रहेगा, किंतु वे सती जी को भी यह रहस्य नहीं बताना चाहते थे कि प्रभु ने अवतार लिया है. (नीचे भी पढ़ें)

उक्त बातें यहां उल्दा में चल रही शिव पुराण कथा के चौथे दिन की जम्मू से आये कथावाचक स्वामी हृदयानंद गिरि ने कही. उन्होंने कहा कि समय बीतता जा रहा था, उधर श्री राम बड़े हो गए और अपने पिता महाराज दशरथ के वचन को निभाने के लिए तपस्वी वेश में दंडक वन में विचरने लगे जहां कपटी रावण ने छल से सीता जी का हरण कर लिया. (नीचे भी पढ़ें)
श्रीराम जब स्वर्ण मृग को मारकर अपने भाई लक्ष्मण के साथ कुटिया में लौटे और सीता जी को वहां नहीं पाकर उनकी आंखों में आंसू आ गए. दोनों भाई सीता को वन में खोजते हुए हर किसी से पूछने लगे कि क्या उन्होंने सीता को देखा है. शिव जी ने इसी अवसर पर श्री राम को जी भर कर देखा, किंतु उचित समय न जानकर परिचय नहीं दिया.




