जमशेदपुर: परसुडीह क्षेत्र के गदड़ा में मंगलवार को दलमा बुरू सेंदरा समिति की एक बैठक दलमा राजा राकेश हेंब्रम की अध्यक्षता में हुई. बैठक में दलमा तिथि व संचालन समिति का गठन किया गया. इस दौरान दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने बताया कि स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख परगना, माझी बाबा, मानकी-मुंडा समेत दिसुआ सेंदरा वीरों से रायमशविरा के बाद सेंदरा तिथि पर अंतिम मुहर लगा दिया गया है. लेकिन पारंपरिक नियम व विधि के अनुसार 3 अप्रैल को गदड़ा में सेंदरा पूजा कर गिरा सकाम (खजूर के पत्ते से बना निमंत्रण पत्र) दिसुआ सेंदरा वीरों को देकर तिथि को सार्वजनिक किया जायेगा. उन्होंने बताया कि इसबार नियमानुसार सेंदरा की तिथि अप्रैल महीने में ही पड़ रहा है. दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने बताया कि दलमा बुरू सेंदरा समिति का एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही रांची जाकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिलेगा और आदिकालों से चली आ रही सेंदरा की परंपरा की वजूद को बचाये रखने की मांग करेगा. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सदियों से पेड़ पौधों की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं. (नीचे भी पढ़ें)
सेंदरा पर्व के दौरान भी सर्वप्रथम वन देवी-देवताओं की पूजा अर्चना कर उनका अनुमति मांगा जाता है. उसके बाद ही दिसुआ सेंदरा वीर घने जंगलों में प्रवेश करते हैं. आदिवासी समाज सेंदरा परंपरा को निभाने के लिए साल में एक दिन जंगलों में जाते हैं. उसके बाद फिर दोबारा सेंदरा के नाम पर जंगलों में नहीं जाता हैं. बावजूद इसके आदिवासियों को सेंदरा पर्व के दिन वन विभाग के द्वारा बेवजह परेशान किया जाता है. उसके पारंपरिक हथियार तीर व धनुष छीन लिया जाते हैं. इस तरह वन विभाग जंगली पशुओं को खत्म होने के लिए आदिवासी समाज को दोषी ठहराते हैं. जबकि आदिवासी समाज इसके लिए कतई दोषी नहीं है. वन विभाग सालोंभर जंगलों देखभाल के नाम पर चोरी-छिपे पेड़-पौधों को कटवाता है. घने जंगल अब सिमट रहे हैं. ऐसे में जंगली पशुओं का घटना तय है. वन विभाग अपने मूल काम से भटक गया है. वन विभाग वन को बचाने के लिए घने जंगल को पर्यटन क्षेत्र बना रहा है. जंगल पशु-पक्षियों के निवास का स्थान है, लेकिन अब वहां आम जनजीवन का दखल हो गया है. वे जंगल में रिसोर्ट व अन्य भवन बनाकर रह रहे हैं. ऐसे में भला जंगली पशु-पक्षी कहां जाये. यही वजह है कि जंगली पशु गांव व शहर में भोजन-पानी व आवास के घूम रहे हैं. वन विभाग को चाहिए कि वन-जंगल पर अनावश्यक दखल बंद करना चाहिए. साथ ही आदिवासी समाज के गांव-घर को छोड़कर शहरी आबादी को वन-जंगल के आसपास बसने से रोकना चाहिए. क्योंकि यही आबादी धीरे-धीरे जंगल के आसपास कंक्रीट के घने जंगल को बना रहे हैं.



