
जमशेदपुर : वैसे तो मां का प्रेम तो अनमोल होता है, लेकिन मां का प्रेम एक बेटी के लिए हो तो वह और भी अनुकरणीय और उदाहरण बन जाता है. ऐसा ही उदाहरण झारखंड के नोवामुंडी के लखनसाइ निवासी अजय मुंडा की पत्नी ने पेश की है. 45 साल की नोवामुंडी की इस मां ने अपनी बेटी का इलाज करने के लिए नोवामुंडी से टीएमएच पहुंच गयी. करीब 90 किलोमीटर का पैदल सफर उसने पूरा किया और टीएमएच में जरूरी कंसेंट पेपर (इलाज के लिए जो दस्तावेज पर परिवार की मंजूरी ली जाती है) पर हस्ताक्षर किया, जिसके बाद उसका इलाज संभव हो सका. वह शुक्रवार की रात करीब साढ़े नौ बजे लॉकडाउन होने के कारण कोई गाड़ी नहीं मिली तो पैदल ही टीएमएच पहुंच गयी. अब उसकी 14 साल की बेटी दुर्गामनी का इलाज हो रहा है. मां के इस जज्बे से खुद टीएमएच के डॉक्टरों का भी दिल भर आया और उन लोगों ने भी मां के इस प्यार और जज्बे को सलाम किया. 23 मार्च को दुर्गामनी (14 वर्षीय) अपने गांव के पास से गुजरने वाली रेलवे लाइन पर शौच के लिए गयी थी. इस बीच ट्रेन आयी तो वह लाइन के पार चली गयी, जिससे वह गिर गयी और उसके पैर और हाथ में गंभीर चोटें आ गयी. वो लोग पहले चाईबलासा सदर अस्पताल गये, जहां इलाज संभव नहीं हो पाया तो एमजीएम अस्पताल रेफर कर दिया गया. एमजीएम अस्पताल के डॉक्टरों ने जांच के बाद स्थिति गंभीर बताकर उसे इलाज के लिए रिम्स रेफर कर दिया. पैसे के अभाव में वह रिम्स के बजाय अपने गांव लौट गयी. इसके बाद नोवामुंडी 2 की जिला परिषद सदस्य लक्ष्मी सोरेन को लोगों ने इस घटना की जानकारी दी, जिसके बाद लक्ष्मी सोरेन ने टाटा स्टील नोवामुंडी से बातचीत की. इसके बाद टीएमएच में मुफ्त में इलाज करने की मंजूरी दे दी गयी. इसके बाद टीएमएच में दुर्गामनी को वहां से एंबुलेंस से लाया गया. उसके साथ उसकी बड़ी बहन भी आयी, जिसकी उम्र 17 साल है. उसको एडमिट करने के लिए उसको हस्ताक्षर करना था, लेकिन चूंकि उसकी बड़ी बहन बालिग नहीं थी, इस कारण दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए कोई मां या बाप का होना अनिवार्य बता दिया गया या कोई बालिग गार्जियन की जरूरत अस्पताल ने बताया. इसके अलावा 4 यूनिट रक्त की व्यवस्था करने को कहा. लड़की की बड़ी बहन के पास पैसे नहीं थे. वह ब्लड बैंक गयी तो प्रोसेसिंग चार्ज नहीं देने के कारण खून नहीं मिला. इसके बाद उसने इसकी जानकारी अपनी मां को दी. उसने गांव के ही एक व्यक्तित को अस्पताल के ही एक व्यक्ति के फोन से मिलाया और अपनी मां को सारी जानकारी दी. मां हिंदी नहीं बोल पाती है और न समझ पाती है और कम सुनती भी है. मां को अपनी बेटी की तड़प सुनायी दे दी, जिसके बाद मां गाड़ी नहीं मिलने पर नोवामुंडी से ही पैदल चल दी. लॉकडाउन के कारण कोई गाड़ी नहीं मिल पायी. करीब 90 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद महिला टीएमएच पहुंची और फिर ऑपरेशन के लिए जरूरी दस्तावेजों में अपने साइन किये, जिसके बाद ऑपरेशन हुआ और चिकित्सकों ने भी पूरा सम्मान दिया. बेटी का सफल ऑपरेशन भी हो पाया.





