जमशेदपुर : झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश संजय कुमार मिश्रा और न्यायाधीश आनंद सेन की बेंच में पीयूसीएल द्वारा दायर पीआइएल रिट (जनहित याचिका) संख्या 3434-2019 की फिर सुनवाई हुई. राज्य सरकार के तरफ से उनके अधिवक्ता ने फिर से दोहराया कि मामले को ग्रीन ट्राइब्यूनल में भेजा जाना चाहिए तथा यह भी कहा कि जो भी हो पर इस मामले में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को जवाब देना है. राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिवक्ता सुनवाई में नदारद रहे. राज्य सरकार की तरफ से हलफनामा दाखिल किया गया पर कंपनियों की तरफ से कोई हलफनामा नहीं दाखिल किया गया है. पीयूसीएल के अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव ने बेंच का ध्यान अखबार में छपी एक रपट की तरफ दिलाया जिसमें उक्त समाचारपत्र द्वारा किये गये सर्वे के मुताबिक लगभग 20 हजार लोग उस क्षेत्र में प्रदूषण जनित बीमारियों के शिकार हैं. उन्हें सांस और फेफड़ों से संबंधित बीमारियां हैं और कुछ लोगों में ये बीमारियां गंभीर हैं. मुख्य न्यायाधीश ने प्रत्युत्तर में कहा कि अखबार की रपटें अतिशयोक्तिपूर्ण भी होती है. इस पर पीयूसीएल के अधिवक्ता ने कहा कि उन्हें व्यक्तिगत तौर पर उसकी जानकारी है क्योंकि वे उस इलाके में गये हैं. उन्होंने आगे कहा कि चौका से कांड्रा जाने के सड़क में (स्टेट हाईवे) काले धुंए का एक गुबार मिलता है और रास्ता दिखाई नहीं देता, इस हालात से उस सड़क से यातायात करने वाले हररोज लोग रूबरू हो रहे हैं. (नीचे भी पढ़ें)
अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव ने खंडपीठ को पुनः बताया कि उक्त कंपनियां पानी के पुन: उपयोग के मानदंडों का उल्लंघन कर गहरे बोरिंग के माध्यम से अवैध रूप से भूजल निकाल कर भूजल में अप्रत्याशित कमी करने और जमीन की उर्वरता को नष्ट करने, ठोस और तरल कचरे के द्वारा जमीन की उपरी सतह को प्रदूषित कर उसे कृषि के लिए अनुपयुक्त बनाने सहित वायु प्रदूषण द्वारा ग्रामीणों के स्वच्छ वायु और जीवन के बुनियादी अधिकारों का राज्य सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मिलीभगत से वर्षों से उल्लंघन कर रही है. उन्होंने अदालत से दरख्वास्त किया कि अदालत एक स्वतंत्र समिति बनाकर इलाके की प्रदूषण की स्थिति की अद्यतन रपट मंगा सकती ताकि अदालत प्रदूषण से हुई गंभीर और मारक परिस्थितियों से आमलोगों को निजात दिलाने के लिए जरुरी आदेश पारित कर सके. बेंच ने अगली सुनवाई के उपरांत कुछ अस्थायी दिशा-निर्देश जारी का भरोसा दिलाया. ज्ञातव्य है कि पीयूसीएल ने अपने उक्त पिटीशन में झारखंड सरकार द्वारा पर्यावरण नियमों का एकमुश्त उल्लंघन कर स्पंज आयरन कंपनियों को स्थापित करने और प्रदूषण मानकों का घोर उल्लंघन कर स्पंज आयरन बनाने वाली और ग्रामीणों के पानी के बुनियादी अधिकार के साथ उनके जीवन के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों-सिद्धि विनायक मेटकॉम लिमिटेड, नरसिंह इस्पात लिमिटेड, जय मंगला स्पंज आयरन प्राईवेट लिमिटेड, कोहिनूर स्टील प्राईवेट लिमिटेड, जूही इंडस्ट्रीज प्राईवेट लिमिटेड, चांडिल इंडस्ट्रीज प्राईवेट लिमिटेड, डिवाईन एलॉयज एंड पावर लिमिटेड तथा एम्मार एलॉयज प्राईवेट लिमिटेड को तत्काल बंद करने की मांग की गयी है. ज्ञात हो कि इससे पहले की सुनवाई में उच्च न्यायालय ने मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन के मद्देनजर एडवोकेट जेनेरल के नेशनल ग्रीन ट्राईब्यूनल में मामले को भेजने के तर्क को खारिज कर इस संवेदनशील मामले का संज्ञान लिया और भारत सरकार, राज्य सरकार, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित तमाम दोषी कंपनियों के खिलाफ नोटिस निर्गत किया. (नीचे भी पढ़ें)
ज्ञातव्य है कि याचिकाकर्ता पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने चौका, चांडिल और उसके आसपास लगभग 2-3 वर्ग किमी क्षेत्र में स्थित उपरोक्त 9 कंपनियों के खिलाफ पर्यावरण दिशा-निर्देशों का उल्लंघन कर स्पंज आयरन प्लांट स्थापित करने, ग्रामीणों को पानी से महरूम करने, जमीन की उर्वरता बरबाद करने, हवा के उत्सर्जन मानदंडों का घोर उल्लंघन कर क्षेत्र को प्रदूषित करने और प्राकृतिक जल धाराओं को दूषित करने के खिलाफ 2019 में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दाखिल किया था. वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार के 30 मई, 2008 के नोटिफिकेशन के अनुसार स्पंज आयरण प्लांटों की स्थापना राज्य सरकार द्वारा घोषित इंडस्ट्रियल एरिया में और आबादी से कम से कम एक किमी दूर, केन्द्र और राज्य हाईवे से आधा किमी दूर होना चाहिए तथा दो स्पंज प्लांटों के बीच 5 किमी की दूरी होनी चाहिए जबकि चौका में लगभग दो से तीन वर्ग किमी के अंदर ये नौ कंपनियों के प्लांट स्थापित हैं. केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वायु की गुणवत्ता मानक पर 18 नवम्बर, 2009 के नोटिफिकेशन में जो गुणवत्ता मानक तय किये गये हैं उनका घोर उल्लंघन कर रही है ये कंपनियां और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जिसे हर वर्ष 104 दिनों का वायु गुणवत्ता की माप करनी है, ने इस इलाके में वायु प्रदूषण या उत्सर्जन की जांच करने वाली कोई व्यवस्था स्थापित नहीं की है. पीयूसीएल के तरफ़ से अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव, रोहित सिंह और मंजरी सिंहा ने सुनवाई में हिस्सा लिया.



