रांची : झारखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने लोकायुक्त से एक लिखित शिकायत कर भारतीय वन सेवा (आइएफएस) के अधिकारी राजीव लोचन बख्शी के खिलाफ भ्रष्टाचार की लिखित शिकायत दर्ज करायी है. इसमें आरोप लगाया गया है कि राजीव लोचन बख्शी आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त है. इसकी जांच कराकर कार्रवाई की जानी चाहिए. वे लंबे समय से सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में है. अपने पत्र में बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि राजीव लोचन बख्शी भारतीय वन सेवा के झारखंड कैडर के चर्चित अधिकारी हैं. उनकी कुशलता नियमों और कानूनों के पालन में न होकर ‘सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग कर उच्च स्तर पर हर प्रकार की विशिष्ट सेवा-प्रदाता‘ की रही है. अपने इन्हीं काले कारनामों को छिपाने हेतु वर्तमान में वे सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग तथा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सर्वेसर्वा बने हुए हैं और निर्बाध रूप से भ्रष्टाचार कर रहे हैं. यह बताया गया है कि झारखंड महालेखाकार (एजी) ने रांची वन प्रमंडल (वर्ष 2013-2018) के उनके कार्यकाल के ऑडिट में अनेक गंभीर अनियमितताओं को अंकित किया है. (नीचे भी पढ़ें)
इसमें महालेखाकार ने अप्रैल 2016 से मार्च 2019 की अवधि के 95 मस्टर रोल्स की टेस्ट चेकिंग में पाया कि झारखंड कोषागार संहिता के नियम 242-243 का घोर उल्लंघन किया गया है. इन मस्टर रोल्स पर बिना मजदूरों के हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान लिए भुगतान दिखाया गया है. इन अभिलेखों पर ‘व्हाइटनर‘ और ‘इरेजर‘ लगाकर आपराधिक तरीके से बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई है. यह भी बताया गया है कि इन मस्टर रोल्स को रेंजर, सहायक वन संरक्षक (एसीएफ) या स्वयं डीएफओ ने कभी चेक या सत्यापित नहीं किया. मजदूरों को भुगतान बैंक या पोस्ट ऑफिस के खातों के माध्यम से करने के आदेशों का उल्लंघन कर नकद दिखाया गया है. इन मात्र 95 मस्टर रोल्स के माध्यम से ही 1.0383 करोड़ रुपये का संदिग्ध भुगतान दिखाया गया है. बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण कर वन भूमि का अपयोजन – वर्ष 2013-14 में श्री बख्शी ने ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के प्रस्तावों को नियम विरुद्ध आठ छोटे खंडों (एक हेक्टेयर या उससे कम) में विभाजित कर दिया, ताकि 7.35 हेक्टेयर वन भूमि के अपयोजन का आदेश वे स्वयं डीएफओ स्तर पर दे सकें. इसके माध्यम से राज्य सरकार के पास प्रस्ताव भेजने से बचा गया और यूजर एजेंसी को अनुचित लाभ पहुंचाते हुए सरकार को न्यूनतम 46.01 लाख रुपये की एनपीवी राशि का सीधा नुकसान पहुंचाया गया. (नीचे भी पढ़ें)
वित्त वर्ष 2014-15 में (जनवरी से मार्च के बीच) विभिन्न रेंजरों को 8,53,40,488 रुपये का अग्रिम दिया गया, जिसका लेखा-जोखा जानबूझकर जुलाई 2015 तक महालेखाकार को समर्पित नहीं किया गया, ताकि उस समय चल रहे ऑडिट से इस भारी राशि के व्यय को छिपाया जा सके। इस राशि का कभी भौतिक सत्यापन नहीं हुआ. वित्त वर्ष 2013-14 में 1.80 करोड़ रुपये की सामग्री खरीद के मूल वाउचर ऑडिट टीम को उपलब्ध ही नहीं कराए गए और भ्रामक तर्क दिया गया कि वे महालेखाकार को भेज दिए गए हैं. चूंकि, सामग्री खरीद का कोई प्रमाण (द्वितीय प्रति) प्रमंडलीय कार्यालय में मौजूद नहीं था, अतः स्पष्ट है कि कोई वास्तविक खरीद नहीं हुई. जब सामग्री ही नहीं खरीदी गई, तो उससे संबंधित कार्यों पर दिखाई गई लगभग 5.45 करोड़ रुपये की मजदूरी का भुगतान स्वतः ही फर्जी और बोगस सिद्ध हो जाता है. उन्होंने इस मामले में एसआइटी बनाकर जांच कराने और एफआइआर दर्ज कराकर फारेंसिक ऑडिट कराने की मांग की है.




