प्रकाश दास / गालूडीह : पश्चिम बंगाल के गफ्फर गाजी नामक एक किसान सकारात्मक तरीके से समाज में कुछ बेहतर मछली पालकों के लिये प्रेरणास्रोत बनने का ऐसा संकल्प लिया कि आज लोग कहते हैं मछलीपालन करो तो गब्बर जैसा. मछली पालन देखकर ग्रामीण उन्हें फिश किंग कह रहे है. उनका मछली पालन का शौक आज उनकी प्रसिद्धि का कारण बन गया है. जोड़िसा पंचायत अंतर्गत छोलागोड़ा गांव के सीताडांगा टोला में इस किसान ने जनवरी महीने में मछली पालन का सफर शुरू किया. (नीचे भी पढ़ें)

दो एकड़ जमीन में शुरू किया मछली पालन : किसान गफ्फर गाजी ने बताया कि पश्चिम बंगाल से आकर सीताडांगा गांव निवासी सृष्टिधर महतो से दो एकड़ जमीन लीज में लेकर मछली पालन शुरू किया. उक्त जमीन पर चार तालाबों का निर्माण किया गया है. उन्होंने कहा कि यहां का मिट्टी और पानी मछली पालन के लिए उपयुक्त है. मछली पालन के लिए हमारी चार लोगों की टीम हर समय मछलियों की देखरेख के लिए मौजूद रहते हैं. उन्हें समय पर खाना देना और देखभाल करना पड़ता है. कई बार ऐसा होता है जब मछलियां खाना पीना छोड़ देती है तब उनको बीमारी के अनुसार दवा देकर ठीक किया जाता है. इसके लिए अनुभवी मछली पालन करने वालों से परामर्श ली जाती है. मछलियों को पोल्ट्री के वेस्ट पार्ट को मशीन से पीस कर पेस्ट बनाकर खिलाया जाता है. एक बच्चे की तरह मछलियों को पालकर बड़ा किया जाता है. पानी के लिए तालाब के किनारे पंप की व्यवस्था की गयी है. 45 दिन बाद पानी को बदल दिया जाता है. चारों तालाबों को पंप के पानी से भरा जाता है. जैसे-जैसे पानी घटता जाता है पंप पानी डाल कर तालाबों को भरा जाता है. (नीचे भी पढ़ें)
8 से 9 महीने में तैयार हो जाती है मछलियां : किसान चार तालाबों में कई तरह की मछलियां पालते हैं. इनमें रोहू, कतला, मांगुर, टेगड़ा, बाटा, मिरगेल, कालबोस, पुटी, तेला पिया आदि शामिल हैं. मछलियों का चारा कोलकाता के नोआहाटी से लाया जाता है. सभी मछलियां करीब 8 से 9 महीने में पूर्ण रूप से तैयार हो जाता है. मछलियों को पकड़ने के लिए पश्चिम बंगाल से लोग बुलाया जाता है. फिर मछलियों को जमशेदपुर भेजा जाता है. बाजार में जिंदा मछलियों की काफी मांग है इसीलिए मछलियों को पकड़कर जिंदा ले जाया जाता है. इसके लिए ऑक्सीजन का उपयोग किया जाता है. बाजार में 90 से 100 रुपए होलसेल दर पर बेचा जाता है.



