
Chakuliya : चाकुलिया के पुराना बाजार स्थित चावोवीरो मंदिर में रुंगटा परिवार द्वारा आयोजित नौ दिवसीय रामकथा के दूसरे दिन कथा वाचन करते हुए रामशंकर दास महराज ने कहा कि संतो का दर्शन और कथा सुनने का मौका सत्संग पुण्य से प्राप्त होता है. सबसे बड़ा पुण्य है संतो की चरणों की पूजा करना. पुण्य की वृद्धि मंदिर जाने, सत्संग में आने से और संतो की पूजा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है. सत्संग में जाने से पुण्य की वृद्धि होती है. सत्संग का पुण्य बड़ा है कि तपस्या का पुण्य? इस विषय पर उन्होंने कहा कि सत्संग का पुण्य बड़ा है. सत्संग में जो आनंद है किसी दूसरे में नहीं है. सत्संग पाप नास का प्रमुख साधन है. जीवन में पाप कम करना है तो सत्संग करें. अच्छे भक्त वे होते हैं जो किसी की भक्ति में भेद नहीं करते हैं. भगवान शंकर और राम में कोई अंतर नहीं है. मन व हृदय को निर्मल करें, हृदय साफ नहीं होगा तो हम भगवान को प्राप्त नहीं कर सकते. मन में कपट रहे यह भगवान को पसंद नहीं है. भगवान की कथा गंगा समान है. स्वामी की सबसे बड़ी सेवा है आज्ञा का पालन करना. कथा वाचते हुए महराज जी ने कहा कि राम अवतार के कई कारण हैं. भगवान श्राप से मुक्ति दिलाने, भक्तों की रक्षा करने और धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेते हैं. कथा में तुलसीदास जी कहते हैं कि भगवान का अवतार सिर्फ भक्तों से मिलने के लिए होता हैं. नारद जी के श्राप के कारण भगवान राम को धरती पर अवतार लेना पड़ा था. विश्वमोहिनी से भगवान ने स्वंयवर में नारद को बंदर मुख बना दिया और खुद विश्वमोहिनी से विवाह कर लिए थे. इस पर नारद जी ने श्राप दिया था कि जिस राजकुमार के रूप धारण किये थे, उस रूप में अवतार लेना होगा. नारद जी के श्राप के कारण भगवान को राम अवतार लेना पड़ा था. संतो का श्राप जग कल्याणकारी होता है.

महाराज जी ने कहा कि भगवान के इशारे पर नाचना अच्छा है और काम के इशारे पर नाचना अहित है. अभिमान ही पतन का कारण है. जीवन में कभी अभिमान नहीं करना चाहिए अभिमान जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है. रामशंकर जी महाराज ने कहा कि जीवन में हितैषी सोच समझ कर करनी चाहिए. हमारा हित सिर्फ भगवान ही करते हैं. भगवान कभी भी अपने भक्त की जग हंसाई नही करते हैं. मनुष्य मनु की संतान है. भगवान से प्रकट हुआ है धर्म. जीवन वैराग्य होगा तो ही भगवान से लगाव होगा. मनुष्य जीवन का लक्ष्य है भगवान की भक्ति करना है. मनुष्य जीवन वही श्रेष्ठ है जो भगवान की भक्ति करता है और भगवान का नित भजन करे. संसार में वही ज्ञानी है जो भगवान को जान लिया. भगवान के ज्ञान के बगैर सारा ज्ञान अधूरा है. संसार में कुछ भी सत्य नहीं है. संसार नाशवान है, भगवान सिर्फ अविनाशी हैं. भगवान के नाम का जप करें, जीवन में सत्संग करें, जीवन सफल होगा. संसार को त्याग और वैराग्य की दृष्टि से देखें, तभी भगवान के प्रति मन लगेगा. मन चंचल है पर मन को भगवान के प्रति लगाने का अभ्यास करें. तभी मन भगवान की भक्ति के प्रति लगेगा. वेद भगवान कहते हैं कि मन लगाम है. इंद्रियां घोड़े हैं और शरीर रथ है. जीवन को मोक्ष की प्राप्ति के लिए मन और इंद्रियों को काबू में कर मन को प्रभु के चरणों में समर्पित करें. जीवन को मोक्ष की प्राप्ति होगी. सबसे बड़ा त्यागी वही है जो सबकुछ होते हुए भी उसको भोगने की मन में लालसा न हो. सत्संग सिर्फ संतो से सुनें, संतों की वाणी में वैराग्य होता है. मंत्रो का जाप प्रेम और अनुराग से करें, तो ठाकुर जी के प्रति ध्यान होगा. जब भी भगवान का ध्यान या नाम लें तब हृदय में भगवान का स्वरूप लायें, तभी ध्यान पूर्ण होगा. श्रोताओं में शंकर रुंगटा, गणेश रुंगटा, ओम प्रकाश रुंगटा, कमल रुंगटा, महाबीर रुंगटा, केशव रुंगटा, परमेश्वर रुंगटा, विनीत रुंगटा, विजय रुंगटा, कौशल रुंगटा, कमल खंडेलवाल, चन्द्रदेव महतो, सुधीर बेरा, पतित पावन दास, अवधेश यादव समेत काफी संख्या में स्थानीय लोग उपस्थित थे.







