- इस्लाम मजहब में कुर्बानी के महत्व को बताती है बकरीद

जमशेदपुर : बकरीद को ईद-उल-अजहा, ईद-उल-जुहा, बकरा ईद, के नाम से जाना जाता है. बकरीद इस साल शनिवार यानी 1 अगस्त को मनायी जाएगी. इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार हर साल बकरीद 12वें महीने की 10 तारीख को मनाई जाती है. यह रमजान माह के खत्म होने के लगभग 70 दिनों के बाद मनाई जाती है. बकरीद पर कुर्बानी देने की प्रथा है. यह इस्लाम मजहब के प्रमुख त्योहारों में से एक है. इस्लाम में इसका बड़ा ही महत्व है. वहीं इस पर्व को लेकर जमशेदपुर के एसएसपी डॉ एम तमिल वाणन ने मुसलिम समुदाय के लोगों को बकरीद पर्व की शु्भकामना एवं बधाई दी है. लोगों से हर वर्ष की तरह इस बार भी सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में बकरीद मनाने की अपील करते हुए एसएसपी श्री वाणन ने कहा है कि राज्य में गौवंश अधिनियम 2005 लागू है. अत: गौवंश की कुर्बानी करने से बचें, अन्यथा पकड़े जाने पर कठोर कार्रवाई की जायेगी. इसके साथ ही एसएसपी ने कोरोना संकट को देखते हुए शासन-प्रशासन के निर्देशों व सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की अपील की है.
ऐसे मनाई जाती है बकरीद
बकरीद पर इस्लाम धर्म के लोग साफ-पाक होकर नए कपड़े पहनकर नमाज पढ़ते हैं. नमाज पढ़ने के बाद कुर्बानी दी जाती है. ईद के मौके पर लोग अपने रिश्तेदारों और करीबों लोगों को ईद की मुबारकबाद देते हैं. ईद की नमाज में लोग अपने लोगों की सलामती की दुआ करते हैं. एक-दूसरे से गले मिलकर भाईचारे और शांति का संदेश देते हैं. इस पर्व को लेकर बाजारों में भी रौनक दिखाई देती है.
इनकी दी जाती है कुर्बानी
बकरीद का पर्व इस्लाम के पांचवें सिद्धान्त हज को भी मान्यता देता है. बकरीद के दिन मुस्लिम बकरा, भेड़, ऊंट जैसे किसी जानवर की कुर्बानी देते हैं. इसमें उस पशु की कुर्बानी नहीं दी जा सकती है जिसके शरीर का कोई हिस्सा टूटा हुआ हो, भैंगापन हो या जानवर बीमार हो. बकरीद के दिन कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है. एक खुद के लिए, दूसरा सगे-संबंधियों के लिए और तीसरे हिस्से को गरीब लोगों में बांटे जाने का चलन है.
बकरीद का इतिहास
इस्लाम मजहब की मान्यता के अनुसार, कहा जाता है अल्लाह ने हजरत इब्राहिम से सपने में उनकी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी मांगी थी. हजरत इब्राहिम अपने बेटे से बहुत प्यार करते थे, लिहाजा उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का फैसला किया. अल्लाह के हुक्म की फरमानी करते हुए हजरत इब्राहिम ने जैसे ही अपने बेटे की कुर्बानी देनी चाही तो अल्लाह ने एक बकरे की कुर्बानी दिलवा दी. कहते हैं तभी से बकरीद का त्योहार मनाया जाने लगा. इसलिए ईद-उल-अजहा यानी बकरीद हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में ही मनाया जाता है.








