
रांची : झारखंड में झाऱखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) नियुक्ति में भाषा विवाद के मामले ने तूल पकड़ लिया है. बीते दिनों झारखंड सरकार ने तृतीय और चतुर्थ श्रेणियों की नौकरी में 12 क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल किया है. अब इस मुद्दे को लेकर राजनीति शुरू हो गयी है. यह मामला धीरे धीरे पूरे राज्य में आंदोलन का रूप ले रहा है. भाजपा और आजसू इसे राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार शामिल सहयोगी दल भी इस निर्णय के पक्ष में नहीं हैं. सरकार के इस निर्णय ने मंत्रियों व विधायकों की भी परेशानी बढ़ा दी है. वहीं राज्यभर के छात्रों में भी इस मामले को लेकर उबाल है. अब क्षेत्र के युवा सरकार से जवाब मांग रहे है. अगस्त में आंदोलन की तैयारी चल रही है. भाजपा ने राज्य सरकार की नयी नियुक्ति नियमावली को झारखंड की जनता के बीच भेदभाव करने वाला बताया. पार्टी ने इसका विरोध करने का निर्णय भी लिया है. भाजपा ने कहा है कि इस नीति को लागू नहीं होने दिया जायेगा. नियुक्ति नियमावली को लेकर आजसू ने भी पुरजोर विरोध किया है. पार्टी प्रवक्ता देवशरण भगत ने इसे झारखंड आंदोलन की मूल भावना के विपरीत बताया है. झामुमो के पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री मिथिलेश ठाकुर ने भाषा को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज करायी है. उन्होंने 12 क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल करने के अलावा मगही और भोजपुरी को भी क्षेत्रीय भाषा की सूची में शामिल करने की मांग की है. ताकि, पलामू प्रमंडल के तीन जिलों गढ़वा, पलामू व लातेहार के अलावा चतरा जिले के युवाओं को जेएसएससी की परीक्षा में समान रूप से मौका मिले.इधर, सरकार ने जो जेएसएससी नियुक्ति नियमावली जारी की है, इसको लेकर हेमंत सरकार में शामिल कांग्रेस भी पक्ष में नहीं है. कांग्रेस की विधायक दीपिका पांडेय ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर इस मामले पर दोबारा विचार करने का आग्रह किया है. उन्होंने कहा कि मंत्रिपरिषद द्वारा झरखण्ड कर्मचारी आयोग द्वारा आयोजित किये जाने वाले परीक्षाओं में क्षेत्रीय भाषाओं की सूची में हिंदी, अंगिका, मैथिली मगही, भोजपुरी आदि को शामिल नहीं करने से राज्य के युवाओं में घोर निराशा है. इस विषय पर सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक सरकार के इस निर्णय की आलोचना हो रही है. उन्होंने आग्रह किया है कि क्षेत्रीय भाषाओं में उक्त भाषाओं को भी शामिल किया जाए. ऐसा नहीं करने से झारखंड के हजारों युवाओं का भविष्य प्रभावित होगा.




