
जमशेदपुर : झारखंड के लिए 8 अगस्त का दिन महत्वपूर्ण है. वजह यह है कि इसी दिन झारखंड आंदोलनकारी और झामुमो के भूतपूर्व केंद्रीय अध्यक्ष और आजसू के संस्थापक शहीद निर्मल महतो का शहादत दिवस है. इसी दिन 8 अगस्त 1987 की सुबह निर्मल महतो की जमशेदपुर के बिष्टुपुर थानांतर्गत चमरिया गेस्ट हाऊस (टाटा स्टील की गेस्ट हाऊस) की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी. उनकी हत्या तब की गयी थी जब निर्मल महतो अपने साथी रहे सूरज मंडल के साथ बाहर निकल रहे थे. उसी समय एक एंबेस्डर कार से पांच लोग उतरे. सूरज मंडल को शंका हो गयी तो उन्होंने निर्मल दा को गेस्ट हाऊस में जाने को कहा. इस बीच हमलावर ने निर्मल महतो का कॉलर पकड़ लिया, जिसे छुड़ाने के लिए सूरज मंडल लपके. सूरज मंडल ने निर्मल दा को छुड़ा भी लिया, लेकिन फिर अंदर जाने को कहा. इसी बीच सोनारी के रहने वाले बीरेंद्र सिंह ने निर्मल महतो पर तीन गोलियां चला दी. एक गोली उनके मुंह पर, दूसरी गोली पीठ और तीसरी गोली उनके सीने में लगी, जिससे उनकी घटनास्थल पर ही मौत हो गयी. (नीचे पूरी रिपोर्ट पढ़ें और देखें तस्वीरें)

इस हत्याकांड ने पूरे झारखंड ही नहीं बल्कि पूरे बिहार, बंगाल और ओड़िशा के वृहद झारखंड के इलाके में आग लगा दी. इसके बाद तो जो आंदोलन हुआ, उसने इतिहास बदल दिया और फिर अंतत: तत्कालीन बिहार सरकार को झुकना पड़ा और झारखंड अलग राज्य के गठन के लिए अपनी अनुशंसा भेजनी पड़ी और झारखंड अलग राज्य बनने के पहले एक अलग विकास समिति बना दी गयी, जिसके जरिये झारखंड का विकास होगा. (नीचे पूरी रिपोर्ट पढ़ें और देखें तस्वीरें)

बाद में 15 नवंबर 2000 को तत्कालीन केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने झारखंड अलग राज्य का गठन किया. वैसे तो झारखंड अलग राज्य के लिए कई लोगों ने अपनी शहादत दी थी, लेकिन असल आंदोलन अगर तेज हुआ तो निर्मल दा के शहादत के बाद. निर्मल दा की हत्या की जांच सीबीआइ ने की थी. हालांकि हत्या की असल साजिश का खुलासा नहीं हो पाया है. निर्मल दा की निर्मम हत्या जब की गयी, तब उनकी उम्र महज 37 साल थी. एक युवा नेता को झारखंड ही नहीं देश ने खो दिया. हालांकि, हाईकोर्ट से भी हत्यारों को जमानत नहीं मिली और उनकी लाश ही जेल से बाहर आयी.(नीचे पूरी रिपोर्ट पढ़ें और देखें तस्वीरें)

निर्मल महतो कौन थे, उनकी जीवनी एक नजर में
शहीद निर्मल दा का जन्म 25 दिसंबर 1950 को हुआ था. उनके पिता जगबंधु महतो और माता प्रियबाला महतो थी. आठ पुत्र और एक पुत्री में निर्मल दा दूसरे सुपुत्र थे. उनकी प्रारंभिक शिक्षा कदमा स्थित टाटा वर्कर्स यूनियन हाई स्कूल से हुई थी. वहीं से उन्होंने मैट्रिक पास की और फिर जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज से ग्रेजुएशन किया. निर्मल दा खुद पढ़ते थे तो बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाते थे ताकि परिवार को चलाने में उनकी भूमिका भी हो. निर्मल महतो छात्र जीवन से ही राजनीति में रूचि लेने लगे थे. उनमे बचपन से नेतृत्वकारी गुण था. 1975 में कुछ असामाजिक तत्वों से उन्हें मुठभेड़ भी करनी पड़ी और अपनी पढ़ाई उन्हें अधूरी ही छोड़ देनी पड़ी. इसके बाद छात्र आंदोलन का नेतृत्व करते हुए वे झारखण्ड आंदोलन में कूद पड़े. निर्मल दा ने अपना राजनीतिक जीवन झारखंड पार्टी से शुरू किया. (नीचे पूरी रिपोर्ट पढ़ें और देखें तस्वीरें)

इसके बाद वे बड़े नेता बनते गये. झारखंड पार्टी में वे 1980 तक रहे और बिहार विधानसभा का चुनाव भी 1980 में लड़े, लेकिन वे जीत नहीं पाये. 15 दिसंबर 1980 को झामुमो में वे शैलेंद्र महतो के साथ झामुमो में शामिल हो गये. 18 जुलाई 1981 को जमशेदपुर के सोनारी में झामुमो का जिला सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें निर्मल दा को मोर्चा का जिला उपाध्यक्ष निर्वाचित किया गगया. 1 और 2 जनवरी 1983 को धनबाद में झामुमो के प्रथम केंद्रीय महाधिवेशन में उनको केंद्रीय कार्यकारिणी समिति में जगह दी गयी. 6 अप्रैल 1984 को बाकोर में झामुमो की केंद्रीय समिति की बैठक में उनको केंद्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया. फिर झामुमो को आगे ले गये. गुरुजी शिबू सोरेन ने बहुत पहले ही उनको भांप लिया था और गुवा गोलीकांड में निर्मल दा के रोल को याद करते हुए गुरुजी शिबू सोरेन के साथ वे हो गये थे. (नीचे पूरी रिपोर्ट पढ़ें और देखें तस्वीरें)

इसके बाद वे 1984 में ऐसे हालात बने कि उनको झामुमो का केंद्रीय अध्यक्ष बना दिया गया. उनको बिनोद बिहारी महतो के स्थान पर बनाया गया और उस वक्त गुरुजी शिबू सोरेन महासचिव के पद पर थे. 1986 में आजसू का गठन उन्होंने ही छात्र विंग के रुप में किया. इसी आजसू ने झारखंड के निर्माण में अहम भूमिका निभायी. वे इसके बाद एक पहचान बन चुके थे और अवैध धंधेबाजों के खिलाफ आंदोलन चलाते रहे. 28 अप्रैल 1986 के झामुमो के दूसरे केंद्रीय महाधिवेशन में दूसरी बार भी उनको पार्टी का केंद्रीय अध्यक्ष बनाया गया. वे अपनी मौत तक वहीं रहे. इस बीच देश में अनाज का संकट हो गया तो जमाखोरी के खिलाफ आंदोलन शउरू कर दिया. 21 अक्तूबर 1982 को अकाल राहत, चांडिल डैम के विस्थापितों के पुर्नवास और नौकरी की मांग को लेकर तिरुलडीह स्थित ईंचागढ़ प्रकंड कार्यालय पर उनके नेतृत्व में प्रदर्शन हुआ, जिसमें गोलीबारी हो गयी. गोलीकांड में चांडिल कॉलेज के दो छात्र धनंजय महतो और अजीत महतो शहीद हो गये. इसके बाद यह आंदोलन और तेज हो गया.





