संतोष कुमार / सरायकेला : मैं भावयुक्त मुखौटा हूं. मैं सरायकेला छऊ हूं. मैं सरायकेला का परिचय हूं. विश्व रंगमंच पर एक अलग स्थान रखता हूं. मुझे समझने के लिए भाषा नहीं, भावपूर्ण हृदय चाहिए. नर्तक के पहनने और ढोल-नगाड़े-शहनाई की सम्मिलित धुन सुनाई देने के बाद मैं जागरित होकर दर्शकों ही नहीं, पूरे परिवेश को नृत्य के लिए विवश करने की ताकत रखता हूं. (नीचे भी पढ़ें)

मैं झारखण्ड के छोटे से जिले, “सरायकेला- खरसावां” और उसकी माटी की पहचान छऊ नृत्य का केंद्रबिंदु हूं, जिसके बल पर उसके कलाकारों को पद्मश्री और दस संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं. आज सरायकेला छऊ को विश्व मंच पर जो उच्च स्थान प्राप्त है, उसका बड़ा श्रेय मुझे भी प्राप्त है. मैं विश्व पटल पर सरायकेला का विशिष्ट परिचय हूं.(नीचे भी पढ़ें)

जी हां, सरायकेला को अंतराष्ट्रीय स्तर ख्याति दिलाने में यहां की परंपरागत छऊ नृत्य कला की अहम भूमिका रही है. अपनी उत्कृष्ट नृत्य शैली के कारण सरायकेला के जीवन में रंग डालने वाले छऊ नृत्य ने न केवल गांव की देहरी लांघी है, बल्कि इसने अपने प्रांत व देश की सरहद के पार विदेशों में भी अपनी पहचान बनायी है एवं भिन्न-भिन्न भाषा भाषियों को भी प्रभावित किया है.(नीचे भी पढ़ें)

छऊ में मुखौटों के प्रयोग के बाद उसे अंतराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली. या यू कहें कि मुखौटों से ही सरायकेला शैली के छऊ की अलग पहचान बनी. विश्व प्रसिद्ध छऊ की चार शैलियों में सरायकेला व मानभूम शैली के छऊ की अपनी अलग पहचान है. इन दोनों ही छऊ शैलियों में मुखौटों का प्रयोग होता है. जबकि खरसावां व मयूरभंज की छऊ शैलियों के नर्तक मुखौटों का प्रयोग नहीं करते.(नीचे भी पढ़ें)

छऊ के मुखौटे बनाना भी आसान काम नहीं है. मानभूम व सरायकेला शैली के छऊ नृत्य में मुखौटों के सहारे ही नर्तक चरित्र में समाहित होकर उसके अंदाज में नृत्य करते हैं. बताते हैं कि करीब सौ वर्ष पूर्व सरायकेला के प्रसन्न कुमार महापात्र ने सबसे पहले छऊ के लिए मुखौटे तैयार किये थे, जिसके बाद ही इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली. फिलवक्त कई कलाकार इसके मुखौटे तैयार करते हैं.(नीचे भी पढ़ें)
मुखौटों की रंगाई के समय उसके चरित्र का भी ध्यान रखा जाता है. उसके अनुरूप ही मुखौटे बनाये जाते हैं और इसमें उनके के शास्त्रीय व मार्गी रूप का भी ध्यान रखा जाता है. रंगाई के बाद उनके चरित्र के अनुरूप ही उन्हें मुकुट, आभूषण आदि से उन्हें सजाया जाता है. ऐसे एक मुखौटा तैयार करने में आठ से दस दिन लग जाते हैं. आज कई विदेशी भी इन मुखौटों पर शोध करने आते हैं.(नीचे भी पढ़ें)
मुखौटा पहनने के बाद नर्तक को सांस रोकने का अभ्यास करना पड़ता है. मुखौटा पहन कर नृत्य करने के लिए भी महीनों अभ्यास करना होता है, तभी नर्तक मुखौटा पहन कर नृत्य कर पाता है. मुखौटों के बिना सरायकेला व मानभूम शैली के छऊ नृत्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती.(नीचे भी पढ़ें)
सुशांत महापात्र आठ साल की उम्र से बना रहे हैं मुखौटे
सरायकेला के प्रथम मुखैटा निर्माता प्रसन्न कुमार महापात्र के पुत्र सुशांत कुमार महापात्र ने बताया कि उन्होंने आठ साल की उम्र में अपने पिता के साथ मुखौटे बनाना शुरू किया, तब से वे मुखौटे बना रहे हैं. उनके अनुसार पहले इसके लिए बांस की टोकरियों जैसी चीजों का प्रयोग होता था. 1925 में उनके पिता ने पहली बार मिट्टी के मुखौटे बनाये जो सरायकेला छऊ में शामिल किये गये.(नीचे भी पढ़ें)
सुशांत ने बताया कि आज मुखौटा बनानेवाले कलाकारों में समर्पण की भावना में कमी जरूर आई है. उन्होंने कहा कि आज मुखौटे बनाकर जीवन निर्वाह संभव नहीं है. चैत्र पर्व के समय गांवों में छऊ नृत्य के आयोजन होने से कुछ आमदनी जरूर हो जाती है, पर वे इस प्राचीन कला की विरासत को बचाए रखने के लिए ही इससे जुड़े हैं. आर्थिक परेशानी भले हो, इस कला को बचाना जरूरी है.(नीचे भी पढ़ें)
उचित सम्मान नहीं मिलने का है मलाल
महापात्र परिवार को इस बात का मलाल है कि सरायकेला छऊ की शान में चार चांद लगाने वाले मुखौटों के जनक को अब तक कोई सरकारी सम्मान नहीं मिला है. सरायकेला शैली छऊ नृत्य के प्रथम मुखौटा निर्माता स्व प्रसन्न महापात्र को जीते जी या मरणोपरांतभी उनकी कला के लिए कोई सम्मान नहीं मिला. यह मुखौटा ही है जिसने सरायकेला छऊ को विश्व पटल पर स्थापित कराया. (नीचे भी पढ़ें)
प्रसिद्ध मूर्तिकार स्वर्गीय कन्हाई लाल महाराणा एवं स्व विश्वनाथ साहू भी स्व प्रसन्न महापात्र के ही शिष्य थे. सरायकेला छऊ नृत्य के भाव प्रकट करनेवाले विभिन्न मुखौटों को ही सरायकेला छऊ का “मुख्य आकर्षण” माना जाता है और आजतक इस कला को बचाये रखने में महापात्र परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी योगदान करता आ रहा है.(नीचे भी पढ़ें)
छऊ नृत्य के मुखौटा निर्माण में सिद्धहस्त कलाकार सुशांत कुमार महापात्र को भी आजतक भारत सरकार के अधिनस्थ कलाकारों को प्रोत्साहित करनेवाले विभाग से उच्च सम्मान नहीं मिलना आश्चर्यजनक है. कुछ भी हो महापात्र परिवार के छऊ नृत्य के प्रति इस योगदान को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता है. तपन पट्टनाक के छऊ कलाकेंद्र् के डायरेक्टर बनने के बाद से ही छऊ कलाकार अपना हक पाने के लिए भटक रहे हैं. डायरेक्टर पर कलाकारों का मानदेय हड़प लेने का आरोप भी लगा, किन्तु उसकी जांच तक नहीं हुई. कलाकारों की पहुंच सीमित है, पर क्या सरकार की दृष्टि भी ऐसी ही संकुचित है? जरूरत है इन कलाकारों की अवस्था पर दृष्टिपात करने की, जो अब भी सम्मान से भी वंचित हैं.




