जमशेदपुर : प्रकृति की अप्रतीम छटा बिखेरते दलमा का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है. विभागीय अधिकारियों की लापरवाही कहें या जल जंगल जमीन की रक्षा करने का दंभ भरने वाले ग्रामीणों एवं जन प्रतिनिधियों का, दलमा वन्य जीव आश्रयणी के संरक्षण को लेकर सभी लापरवाह हैं. ना तो इको सेंसेटिव जोन के प्रावधानों का अनुपालन हो रहा है, ना ही गजराजों के लिए मिलने वाले फंड का समुचित उपयोग. इतना ही नहीं, ग्रामीणों को मोहरा बनाकर लकड़ी माफिया जंगलों की इमारती लकड़ियों की धड़ल्ले से तस्करी कर रहे हैं, जो लकड़ियां सीधे पश्चिम बंगाल पहुंच रही हैं. (नीचे भी पढ़ें)

हैरान करने वाली बात तो यह है कि सबकुछ वन विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की नाक के नीचे हो रहा है. इतने गंभीर मामले को लेकर वन विभाग मौन है, जो चिंता का विषय है. धीरे-धीरे भू माफिया और जंगल माफिया इको सेंसेटिव जोन का रुख कर रहे हैं, जहां धड़ल्ले से जमीन खरीद बिक्री का खेल चल रहा है. इतना ही नहीं, इको सेंसेटिव जोन में सरकारी नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ रही है. बड़े-बड़े रिसोर्ट, शॉपिंग मॉल, शोरूम, उद्योग-धंधे स्थापित हो रहे हैं. सब कुछ दिख रहा है, मगर कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है. (नीचे भी पढ़ें)
सरकारी योजनाओं की भी खूब बंदरबांट हो रही है. इको सेंसेटिव जोन के लिए जो योजनाएं आ रही हैं उसका सही ढंग से अनुपालन नहीं किया जा रहा है. समय रहते यदि इस दिशा में पहल नहीं की गई तो, वो दिन दूर नहीं जब दलमा अभयारण्य महज कागजों तक सिमट कर रह जाएगा. वैसे कुछ जन प्रतिनिधि एवं सामाजिक कार्यकर्ता इसको लेकर आवाज बुलंद जरूर करते हैं, मगर उनकी आवाज जिम्मेदार अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों तक नहीं पहुंच पाती है.



