जादूगोड़ा : पोटका में कुम्हारों को चाक के लिए मिट्टी मिलना मुश्किल हो गया है, जिसके कारण उन्हें जीवन यापन के लिए अपना पुश्तैनी धंधा छोड़ दूसरा काम करना पड़ रहा है. पोटका क्षेत्र के कई कुम्हार इसी के कारण अपना परंपरागत धंधा छोड़ कर दूसरे काम करने लग गए हैं. प्रखण्ड क्षेत्र के पिछली गांव निवासी संतोष भकत ने बताया कि उनके सहित कम से कम 15 कुम्हार परिवार पालने के लिए अपने पुश्तैनी धंधे से मुंह मोड़ कर अन्य कारोबार से जुड़ गए हैं. कई तो घूम-घूमकर इडली बेचकर परिवार चला रहे हैं. इससे वे प्रतिदिन 300 से 400 रुपये की कमाई कर पा रहे हैं. (नीचे भी पढ़ें)
दूसरी तरफ यह स्थिति सामने आने के बाद जेएलकेएम के स्थानीय नेता भागीरथी हांसदा ने झारखंड सरकार से कुम्हारों की समस्याओं का समाधान कर उन्हें वापस उनके पुश्तैनी धंधे से जोड़ने की पहल किये जाने की मांग की है, ताकि कुम्हारों का अपने मिट्टी के कारोबार से ही परिवार का भरण-पोषण कर सकें व अपने पुश्तैनी धंधे में वापस लौट कर स्वाभिमान के साथ जी सकें. (नीचे भी पढ़ें)
इस तरह अपना परंपरागत धंधा छोड़ कर दूसरा काम शुरू करने वाले पोटका प्रखंड क्षेत्र की माटकू पंचायत के पिछली गांव के 70 वर्षीय संतोष भकत का सामने आया है, जिन्होंने कुम्हार का पुश्तैनी धंधा छोड़ घूम-घूमकर इडली बेचना शुरू कर दिया है, ताकि परिवार का गुजारा हो सके. इस बाबत पूछे जाने पर संतोष भकत ने बताया कि पिछली गांव में डेढ़ सौ घर कुम्हारों के हैं. 15 परिवार अपना मिट्टी का पेशा छोड़ दूसरे कामों में लग गए हैं ताकि उनकी आजीविका चल सके. उन्होंने बताया कि मिट्टी के बरतनों को भट्टी में पकाने के लिए लकड़ियां मिलने में तो मुश्किल हो ही रही है, गांव में मिट्टी के बरतन बनाने के लिए मिट्टी अनुपलब्ध होती जा रही है. उन्होंने सरकार से मिट्टी के साथ ही मिट्टी मिलानेवाली मशीन भी उपलब्ध कराने की मांग की है, ताकि कुम्हार वापस अपनेपुश्तैनी कारोबार से जुड़ अपनी कमाई बढ़ा सकें. उन्होंने अपना दर्द बयां करते हुए संतोष भकत ने बताया कि दिन भर मिट्टी का काम करने पर 50 रुपये तक की भी कमाई नहीं हो पा रही है. उन्होंने बताया कि एक हंडी बनाने में पांच दिन लगते हैं, जिसकी कीमत 60 रुपये मिलती है.




