चांडिल: सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल अनुमंडल अंतर्गत दलमा वाइल्डलाइफ सेंचुरी के माकूलाकोचा चेकनाका के समीप निर्मित नए पर्यटन कॉटेज का रविवार को विधिवत उद्घाटन किया गया. झारखंड के पर्यटन मंत्री सुजीत कुमार सोनू, ईचागढ़ की विधायक सविता महतो तथा दलमा वन प्रमंडल के डीएफओ सवा आलम अंसारी ने संयुक्त रूप से फीता काटकर इस परियोजना का शुभारंभ किया. इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में पर्यटन विभाग और वन विभाग के अधिकारियों के साथ स्थानीय जनप्रतिनिधि एवं ग्रामीण भी मौजूद रहे. पर्यटन मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार दलमा क्षेत्र को एक प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में लगातार कार्य कर रही है. उन्होंने बताया कि टूरिज्म डेवलपमेंट काउंसिल (टीडीसी) से जुड़े 30 युवाओं को आईएचएम मुंबई में विशेष प्रशिक्षण दिलाया गया है. इन प्रशिक्षित युवाओं को पर्यटन गतिविधियों से जोड़कर स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा. उन्होंने कहा कि पर्यटन बढ़ने से स्थानीय लोगों की आय में भी वृद्धि होगी. पर्यटकों के आगमन से होटल, दुकान, परिवहन और अन्य छोटे व्यवसायों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा. उन्होंने कहा कि “पर्यटक यदि एक बोतल पानी या बिस्कुट भी खरीदता है तो उसका लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचता है.” (नीचे भी पढ़ें)

हाथी-मानव संघर्ष पर मंत्री के बयान से छिड़ी बहस : कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों ने मंत्री से दलमा क्षेत्र में लगातार बढ़ रहे हाथी-मानव संघर्ष को लेकर सवाल किया. इसके जवाब में मंत्री ने कहा, “जंगल में घर बनाएंगे तो हाथी तोड़ेगा ही.” मंत्री के इस बयान के बाद स्थानीय लोगों और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों के बीच चर्चा शुरू हो गई. कई लोगों का कहना है कि वर्तमान स्थिति केवल जंगल में अतिक्रमण का परिणाम नहीं है, बल्कि हाथियों के प्राकृतिक आवास में आए बदलाव भी इसकी एक प्रमुख वजह हैं. (नीचे भी पढ़ें)

स्थानीय लोगों ने उठाए कई सवाल : स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में जंगलों में आग लगने और वन क्षेत्र में बदलाव के कारण हाथियों का बड़ा झुंड दलमा क्षेत्र से निकलकर ईचागढ़ और आसपास के इलाकों में अधिक समय बिताने लगा है। उनका आरोप है कि वन्यजीवों के लिए पर्याप्त भोजन और पानी की व्यवस्था नहीं होने से भी उनकी आवाजाही प्रभावित हुई है.
ग्रामीणों का कहना है कि सरकार एक ओर करोड़ों रुपये खर्च कर पर्यटन : सुविधाओं का विस्तार कर रही है, वहीं दूसरी ओर वन्यजीव संरक्षण की मूलभूत चुनौतियों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है. उनका मानना है कि किसी भी वन्य पर्यटन स्थल की सबसे बड़ी पहचान वहां का प्राकृतिक वन्यजीवन होता है. ग्रामीणों का कहना है, “पर्यटक केवल जंगल देखने नहीं आते, बल्कि हाथी, हिरण और अन्य वन्यजीवों को देखने की उम्मीद लेकर आते हैं. यदि जंगल में वन्यजीवों की उपस्थिति कम होगी तो पर्यटन भी प्रभावित होगा.” (नीचे भी पढ़ें)

स्थायी समाधान की मांग : स्थानीय लोगों ने हाथी-मानव संघर्ष को कम करने के लिए प्रभावित क्षेत्रों में सोलर फेंसिंग, सुरक्षा खाई (ट्रेंच), फूड प्लॉट विकसित करने, जल स्रोतों को सुदृढ़ करने तथा स्थायी निगरानी दल की व्यवस्था जैसी ठोस योजनाएं लागू करने की मांग की है.
पर्यटन और संरक्षण में संतुलन की चुनौती : दलमा वाइल्डलाइफ सेंचुरी में नए पर्यटन कॉटेज के उद्घाटन को क्षेत्र के पर्यटन विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. हालांकि स्थानीय लोगों का मानना है कि पर्यटन के साथ-साथ वन्यजीव संरक्षण, प्राकृतिक आवास के संरक्षण और हाथी-मानव संघर्ष के प्रभावी समाधान पर समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है. तभी दलमा को एक सफल और टिकाऊ पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकेगा.




