जमशेदपुर : झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने कहा है कि आज आवश्यकता सिर्फ उत्पादन बढ़ाने की नहीं बल्कि बुनकरों की आय बढ़ाने की भी है. इसके लिए नये डिजाइन, ई-कामर्स, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, कौशल उन्नयन तथा युवाओं की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है. उन्होंने यह भी कहा कि यदि हमारी नई पीढ़ी इस क्षेत्र से जुड़ेगी तो हस्तकरघा उद्योग नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ेगा और रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे. राज्यपाल ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान, स्वयंसेवी संगठन, उद्योग जगत तथा सरकार मिल कर बुनकरों के लिए अनुकूल माहौल बनाएं तो यह परंपरागत उद्योग और मजबूती से काम करेगा. उन्होंने ग्रामीण नौजवानों और महिलाओं को इस क्षेत्र से जुड़ने को कहा ताकि वो आत्मनिर्भर हो सकें. राज्यपाल ने आम जनता से हस्तकरघा उत्पादों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाने की अपील की.(नीचे भी पढ़े)

यहां माइकल जॉन ऑडिटोरियम में वीवर्स डेवलपमेंट एंड रिसर्च आर्गेनाइजेशन द्वारा आयोजित 13वें हस्तकरघा दिवस पर बतौर मुख्य अतिथि राज्यपाल ने कहा कि भारत में हस्तकरघा केवल वस्त्र निर्माण का माध्यम नहीं है बल्कि यह हमारी सभ्यता, संस्कृति, परंपरा और आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक है.
राज्यपाल ने कहा कि दो दिन बाद हम लोग अगस्त क्रांति दिवस मनाएंगे. अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा 9 अगस्त 1942 को दिया गया था. उस दौर में चरखा, खादी और हस्तकरघा सिर्फ वस्त्र निर्माण के साधन नहीं थे बल्कि आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के मजबूत प्रतीक बन गये थे. महामहिम ने कहा कि महात्मा गांधी ने खादी और स्वदेशी को जनआंदोलन का स्वरुप देकर देशवासियों में आत्म गौरव और आत्मनिर्भरता की भावना जगाई थी. झारखंड के जनजातीय और ग्रामीण इलाकों में हस्तशिल्प और हस्तकरघा प्रचुर मात्रा में विद्यमान है. झारखंड का तशर रेशम अपनी उच्च गुणवत्ता के लिए पूरे देश में खास स्थान रखता है. यहां के बुनकरों की कला शानदार है. आज जरूरत इस बात की है कि आधुनिक तकनीक, डिजाइन और विपणन के माध्यमों से जोड़ कर उनके उत्पादों को राष्ट्रीय-अंतरार्ष्ट्रीय बाजारों में उपलब्ध कराया जाए. (नीचे भी पढ़े)

राज्यपाल ने कहा कि उन्होंने बुनकरों की समस्या को नजदीक से देखा, जाना और समझा है. वह जब भारत सरकार में कपड़ा मंत्री थे, तब राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस मनाने की पहल प्रारंभ हुई. इसका उद्देश्य देश के बुनकरों में श्रम कौशल और योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान देना तथा हस्तकरघा क्षेत्र को नई पहचान प्रदान करना था. बुनकर केवल वस्त्र नहीं बुनता बल्कि अपने परिवारों के सपने, सभ्यता, संस्कृति और देश के मान-सम्मान को भी सहेजने का काम करता है. उनकी आजीविका को मजबूत करना. उन्हें बेहतर बाजार दिलवाना, सम्मान तथा सुरक्षा उपलब्ध कराना सबकी जिम्मेदारी है. राज्यपाल ने कहा कि प्रधानमंत्री लगातार इस बात पर बल देते हैं कि भारत की पारंपरिक कला और हस्तशिल्प हमारे विकसित भारत की आर्थिक शक्ति बन सकते हैं. उन्होंने कहा कि हमें स्थानीय उत्पादों को अपनाना चाहिए और बुनकरों का भी सम्मान करना चाहिए. इसके पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अनिल ठाकुर ने कहा कि आज के दौर में बुनकरों के हुनर को प्रोत्साहित करने की जरूरत है. (नीचे भी पढ़े)

इन्हें उचित अवसर मिलना चाहिए. केवीआईसी के पूर्व सदस्य मनोज सिंह ने कहा कि बुनकर बहुत मेहनत करते हैं लेकिन उन्हें उनका उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता. सच तो यह है कि आज भी देश में हस्तकरघा उद्योग उपेक्षित है. हस्तकरघा उद्योग की तकनीकी पुरानी है. यहां नई तकनीकी की आमद होनी ही चाहिए. कार्यक्रम के प्रारंभ ने राज्यपाल और मंचासीन अतिथियों ने दीप प्रज्जवलित किया. इसके बाद अतिथियों का स्वागत किया गया. स्वागत भाषण श्रम मंत्रालय के पूर्व बोर्ड सदस्य आनंद साहू ने किया. मंच संचालन वीवर्स डेवलपमेंट एंड रिसर्च आर्गेनाइजेशन के संस्थापक अध्यक्ष विजय भारती ने जबकि आभार प्रदर्शन स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट के ट्रस्टी आशुतोष राय ने किया.इस मौके पर राज्यपाल ने बलराम पात्रो, मंगल पात्रो, अमित मोदक, अनीता मैत्रे और बिलाय तांती को पुरस्कृत किया.




