
जमशेदपुर : जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में रविवार को विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर अपनी पहचान को पहचानो नारे की गूंज के साथ एक विशाल जनसभा का भव्य आयोजन किया गया. आदिवासी समुदाय के सैकड़ो लडके औऱ लड़कियों ने इसमें हिस्सा लिया. आदिवासी छात्र एकता के तत्वावधान में आयोजित इस महाजुटान में केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि संपूर्ण कोल्हान क्षेत्र सहित झारखंड के विभिन्न जिलों, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों से भारी संख्या में छात्र-छात्राएं, प्रबुद्ध बुद्धिजीवी, शिक्षाविद और पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के प्रतिनिधि एकजुट हुए. समारोह का दृश्य विहंगम और सांस्कृतिक ऊर्जा से परिपूर्ण था. (नीचे देखे पूरी खबर)

समाज के लोग अपनी सदियों पुरानी समृद्ध परंपरा का निर्वहन करते हुए पारंपरिक वेशभूषा, पारंपरिक हथियारों तथा ढोल-नगाड़ों की थाप के साथ मैदान में पहुंचे थे. ढोल-नगाड़ों की गूंज और पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों की उपस्थिति ने आदिवासी समाज की जीवंतता, गौरवशाली इतिहास और अदम्य साहस को जीवंत कर दिया. इस महाजुटान के माध्यम से आदिवासी समाज के लोगों ने अपनी सामाजिक एकता, अखंडता और अस्तित्व की रक्षा के लिए एकजुटता का परिचय दिया. जनसभा के प्रमुख मुद्दे और मांगें उठायी गईं. इसमें झारखंड में एनइपी के अचानक लागू होने से लाखों विद्यार्थियों का भविष्य अधर में लटका है, जिस पर ठोस निर्णय लिया जाये. प्रकृति पूजक आदिवासियों को उनकी विशिष्ट पहचान के लिए सरना धर्म कोड देकर संवैधानिक मान्यता दी जाये. भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 का अनुपालन हो और अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण से पहले ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य की जाये. देश के सभी आदिवासी बहुल क्षेत्रों को संविधान के अनुच्छेद 244(1) के तहत पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत लाया जाये. बिना मेसा कानून बनाये अनुसूचित क्षेत्रों में नगर निगम या नगरपालिका चुनाव को असंवैधानिक मानते हुए रोक लगायी जाये. (नीचे देखे पूरी खबर)

असम में रहने वाले संताल, हो, मुंडा व उरांव (टी-ट्राइब्स) को अनुच्छेद-342 के तहत अनुसूचित जनजाति में सूचीबद्ध किया जाये. पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों में लैंड बैंक को अविलंब रद्द किया जाये. झारखण्ड राज्य के निजी क्षेत्रों में स्थानीय उम्मीदवारों का नियोजन विधेयक 2021 को जल्द से जल्द लागू किया जाये. हो, मुण्डारी, भूमिज एवं कुडूख भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाये. जनसमूह ने अपने संवैधानिक हक, सम्मान और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होकर एक नये आंदोलन का शंखनाद किया. ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य सह आदिवासी छात्र एकता के मुख्य संरक्षक जोसाई मार्डी ने आदिवासी समाज के संघर्षपूर्ण इतिहास पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि आदिवासी समाज कभी अन्याय के आगे झुका नहीं है. (नीचे देखे पूरी खबर)
अपना हक व अधिकार हरहाल में लेकर ही रहता है. आदिवासी समाज की यह खासियत रहा है कि वे तबतक चुप रहते हैं जब तक पानी सिर से ऊपर उठ ना जाये. लेकिन जब सब्र का बांध टूट जाता है तो वह किसी के रोकने से नहीं रूकते हैं. आदिवासियों का इतिहास हमेशा से शोषण के खिलाफ संघर्ष और असीम बलिदान का रहा है. इतिहास साक्षी है कि जब-जब बाहरी शक्तियों या शोषकों द्वारा उनके अस्तित्व, अस्मिता और जल, जंगल व जमीन पर हमला किया गया है, तब-तब आदिवासियों ने तीरों की नोक पर अन्याय और अन्यायपूर्ण नीतियों के खिलाफ मुक्ति की जंग लड़ी है. जोसाई मार्डी ने वर्तमान परिदृश्य पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज के आधुनिक समय में भी आदिवासी समाज की स्थिति बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती. वर्तमान दौर में भी जल-जंगल-जमीन को छीनने और आदिवासियों को उनके मूलभूत संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने की निरंतर कोशिशें की जा रही हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समाज अपनी पहचान, भाषा, संस्कृति और अधिकारों के प्रति अभी जागरूक नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व पर गंभीर संकट मंडराने लगेगा. इसलिए आज का यह महाजुटान केवल एक दिवस मनाने का औपचारिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह अपनी जड़ों की ओर लौटने, अपनी पहचान को पहचानने और अपने अधिकारों की पुनः प्राप्ति के लिए शुरू किये गये एक नये सामाजिक व सांस्कृतिक आंदोलन का आगाज है. जनसभा में उपस्थित विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों और छात्र नेताओं ने भी अपने विचार रखे. (नीचे देखे पूरी खबर)
सभी वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आदिवासी समाज को यदि अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करना है, तो उन्हें शिक्षा, एकजुटता और सामाजिक चेतना को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाना होगा. वक्ताओं ने कहा कि जल, जंगल और जमीन केवल आजीविका के साधन नहीं हैं, बल्कि ये आदिवासी जीवन शैली, संस्कृति और आध्यात्मिक पहचान के मूल आधार हैं. इनकी रक्षा करना हर आदिवासी का नैतिक और सामाजिक कर्तव्य है. कार्यक्रम के अंत में सभा में जनसभा में शामिल लोगों ने हाथ उठाकर और पारंपरिक उद्घोष के साथ संकल्प लिया कि वे अपनी भाषा, संस्कृति, जल-जंगल-जमीन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा एकजुट रहेंगे तथा अन्याय के खिलाफ अहिंसक व संवैधानिक रूप से अपना संघर्ष निरंतर जारी रखेंगे.




