कोलकाता : टाटा वर्कर्स यूनियन के उपाध्यक्ष डॉ शाहनवाज़ आलम ने “कोड शिफ्ट – अ नेशनल कॉन्क्लेव ऑन नेविगेटिंग द लेबर कोड्स” में दो महत्वपूर्ण सत्रों में पैनलिस्ट के रूप में भाग लिया. यह राष्ट्रीय सम्मेलन 12–13 सितंबर 2026 को पश्चिम बंगाल नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिडिकल साइंसेज, कोलकाता के यूनिवर्सिटी ऑडिटोरियम में आयोजित हुआ. सेंटर फॉर फिनांश्यल एंड रेगुलेटरी गवर्नेंस स्टडीज ने ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ टैक्स प्रैक्टिशनर्स (पूर्वी क्षेत्र) के सहयोग एवं इंप्लॉईज प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (ईपीएफओ) के पूर्वी क्षेत्र, जेडटीआइ कोलकाता, कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआइसी) के कोलकाता क्षेत्रीय कार्यालय एवं टाटा स्टील के लीगल डिपार्टमेंट के सहयोग से इस कॉन्क्लेव का आयोजन किया. कार्यक्रम में विधि महाविद्यालयों के प्रतिष्ठित शिक्षक एवं विद्यार्थी, विभिन्न कंपनियों के कानूनी विशेषज्ञ, वरिष्ठ एचआर लीडर्स, सार्वजनिक उपक्रमों के वरिष्ठ अधिकारी, श्रम विभाग के वरिष्ठ अधिकारी एवं ब्यूरोक्रेट्स, उद्योग प्रतिनिधि, श्रम कानून विशेषज्ञ, श्रम प्रशासक तथा ट्रेड यूनियन प्रतिनिधि शामिल हुए. सम्मेलन में भारत की नई श्रम संहिताओं के प्रभाव, चुनौतियों और उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर व्यापक चर्चा हुई. (नीचे भी पढ़ें)

द न्यू बार्गेन नामक दूसरे सत्र में इंडस्ट्रियल रिलेशन्स कोड पर चर्चा के तहत हड़ताल, ट्रेड यूनियन, सामूहिक सौदेबाजी, औद्योगिक विवादों के समाधान तथा श्रमिक अधिकारों और व्यावसायिक लचीलेपन के बीच संतुलन पर चर्चा हुई. इसके पैनल में खेतान एड कंपनी के इंप्लॉयमेंट, लेबर एंड बेनिफिट्स के पार्टनर अंशुल प्रकाश, एचपीसीएल के ईस्टर्न रीजन के चीफ जेनरल मैनेजर दुर्गादास मुखर्जी, भारत सरकार के चीफ लेबर कमिश्नर डॉ ओंकार शर्मा एवं टाटा वर्कर्स यूनियन के उपाध्यक्ष डॉ शाहनवाज आलम आदि शामिल रहे. ट्रेड यूनियन के दृष्टिकोण को रखते हुए डॉ आलम ने कहा कि श्रम सुधारों के केंद्र में श्रमिक होने चाहिएं. उन्होंने सामूहिक सौदेबाजी, प्रभावी श्रमिक प्रतिनिधित्व, औद्योगिक लोकतंत्र और निष्पक्ष विवाद समाधान व्यवस्था के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि उद्योगों में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए लचीलापन आवश्यक है, लेकिन यह लचीलापन रोजगार की सुरक्षा, श्रम की गरिमा, निष्पक्षता और श्रमिकों के अधिकारों की कीमत पर नहीं होना चाहिए. (नीचे भी पढ़ें)

“सेफ बाइ डिजाइन” शीर्षक वाले पांचवें सत्र में ऑक्युपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड पर चर्चा में कार्यस्थल की सुरक्षा, नियोक्ता अनुपालन, इंस्पेक्टर कम फलिसिटेटर व्यवस्था तथा व्यावसायिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की वास्तविक परिस्थितियों पर चर्चा की गई. इसके पैनल में इंप्लॉयमेंट लॉज, आर्गस एंड पार्टनर्स के पार्टनर अरका मजुमदार, , कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट की एचआर जीएम कावेरी मुखर्जी, कर्नाचक सरकार के लेबर कमिश्नर डॉ मंजूनाथ एवं टाटा वर्कर्स यूनियन के उपाध्यक्ष डॉ शाहनवाज आलम शामिल रहे. डॉ. आलम ने स्पष्ट किया कि कार्यस्थल की सुरक्षा को केवल कानूनी अनुपालन की औपचारिकता के रूप में नहीं देखा जा सकता. सुरक्षा को कार्यस्थल की डिजाइन, प्रक्रियाओं, उपकरणों और संगठनात्मक प्रणालियों का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए. उन्होंने सुरक्षा प्रबंधन में श्रमिकों की सार्थक भागीदारी, प्रभावी परामर्श व्यवस्था, सुरक्षा समितियों की सक्रिय भूमिका तथा संगठन के प्रत्येक स्तर पर जवाबदेही की आवश्यकता पर जोर दिया. डॉ. आलम ने कहा कि नए लेबर कोड की सफलता का वास्तविक मूल्यांकन केवल कानून के प्रावधानों से नहीं, बल्कि कार्यस्थल पर उनके प्रभावी क्रियान्वयन से होगा. उन्होंने कहा कि श्रम सुधार तभी सफल हो सकते हैं जब औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और व्यावसायिक लचीलापन श्रमिकों की गरिमा, सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और सार्थक प्रतिनिधित्व के साथ आगे बढ़ें. ट्रेड यूनियन केवल श्रम कानूनों के लाभार्थी नहीं हैं, बल्कि एक निष्पक्ष, संतुलित और टिकाऊ औद्योगिक संबंध व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण हितधारक हैं. (नीचे भी पढ़ें)

उन्होंने जोर देते हुए कहा कि प्रतिनिधित्व के बिना केवल संरक्षण पर्याप्त नहीं माना जा सकता. श्रमिकों और उनके प्रतिनिधियों की रोजगार, कार्य परिस्थितियों, व्यावसायिक सुरक्षा तथा औद्योगिक संबंधों से जुड़े निर्णयों में सार्थक भागीदारी और आवाज होनी चाहिए. डॉ आलम ने विशेष रूप से प्रबंधन और श्रमिकों के बीच संवाद, परामर्श और साझेदारी की संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि नए लेबर कोड फ्रेमवर्क को प्रभावी एवं व्यावहारिक रूप से लागू किया जा सके. डॉ शाहनवाज़ आलम की भागीदारी ने सम्मेलन की चर्चाओं में शॉप फ्लोर और श्रमिकों का वास्तविक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया. इससे कानूनी विशेषज्ञों, वरिष्ठ एचआर अधिकारियों, उद्योग प्रतिनिधियों और श्रम प्रशासन के दृष्टिकोण के साथ एक व्यापक एवं संतुलित विमर्श संभव हुआ. (नीचे भी पढ़ें)
दो दिवसीय इस राष्ट्रीय कॉन्क्लेव में विधि महाविद्यालयों के प्रतिष्ठित शिक्षक एवं विद्यार्थी, विभिन्न कंपनियों के कानूनी विशेषज्ञ, वरिष्ठ एचआर लीडर्स, पीएसयू एवं उद्योग जगत के वरिष्ठ अधिकारी, श्रम विभाग के वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट्स एवं अधिकारी, श्रम कानून विशेषज्ञ तथा ट्रेड यूनियन नेता शामिल हुए.कार्यक्रम ने लेबर कोड्स के कानूनी प्रावधानों के साथ-साथ उनके व्यावहारिक क्रियान्वयन पर सार्थक संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया. सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि भारत की नई श्रम व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो औद्योगिक विकास और प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देने के साथ-साथ श्रमिकों की गरिमा, सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा, सामूहिक सौदेबाजी के अधिकार और सार्थक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करे.(नीचे भी पढ़ें)
डॉ. शाहनवाज़ आलम की सक्रिय भागीदारी ने यह संदेश मजबूत किया कि श्रम सुधारों पर राष्ट्रीय विमर्श में श्रमिकों और ट्रेड यूनियनों की आवाज को केंद्रीय स्थान दिया जाना आवश्यक है. उद्योग और श्रमिकों के बीच संवाद, विश्वास और साझेदारी के माध्यम से ही एक सुरक्षित, न्यायपूर्ण, समावेशी और भविष्य के लिए तैयार औद्योगिक व्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है.







