नई दिल्ली : विगत सितंबर माह में खुदरा महंगाई की दर बढ़ कर 5.54 फीसदी हो गई है, जबकि विगत अगस्त महीने में यह 4.83 फीसदी पर थी. हालांकि रिजर्व बैंक ने भी विगत हफ्ते कहा था कि अब ज्यादा चीजों के दाम बढ़ रहे हैं. आइसीआइसीआइ सिक्योरिटीज के अर्थशास्त्रियों ने हालांकि विगत महीने ही कहा कि आरबीआइ ज्यादा चीजों के दाम बढ़ने का इंतजार कर रहा है. वह यह भी मान कर चल रहा है कि महंगाई सिर्फ सामानों की कमी के कारण बढ़ रही है, यह आकलन सही नहीं है. अब उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) के ताजे आंकड़े बता रहे हैं कि महंगाई का असर ज्यादा चीजों पर पड़ने लगा है. ये आंकड़े विगत बुधवार, 12 अक्टूबर को जारी किये गए हैं. (नीचे भी पढ़ें)
सवाल है कि दूसरी चीजों पर महंगाई का असर पड़ने का अर्थ क्या है? सरल शब्दों में कहें तो रोजमर्रा के प्रयोग में आनेवाली अधिकांश चीजों की कीमतें बढ़ रही हैं. शुरू में खाने-पीने और ईंधन की कीमतें बढ़ती हैं, क्योंकि इनके दाम में उतार-चढ़ाव जल्दी होता है. लेकिन जब महंगाई का असर बढ़ता है तो रोजमर्रा की दूसरी चीजें भी महंगी होने लगती हैं, जैसे कपड़े, जूते आदि. महंगाई के बढ़ते प्रभाव को समझने के कई तरीके हैं. सबसे पहला यह मापना कि सीपीआइ में शामिल कितनी चीजों की कीमतें 4 फीसदी से अधिक बढ़ी हैं. (नीचे भी पढ़ें)
जनवरी में भारत के सीपीआइ में शामिल 358 चीजों में से 65 की महंगाई दर 4 फीसदी या उससे अधिक थी, जबकि सितंबर तक यह 129 हो गई है. मतलब दोगुनी चीजों की कीमतें 4 फीसदी से अधिक बढ़ी हैं. 4 फीसदी का आंकड़ा क्यों अहम है? क्योंकि आरबीआइ ने लंबे समय के लिए महंगाई को 4 फीसदी तक नियंत्रित करने का लक्ष्य रखा है. हालांकि इसमें 2 फीसदी की कमी या बढ़ोतरी के छूट दिये गए हैं. मतलब यह न्यूनतम 2 फीसदी या अधिकतम 6 फीसदी हो सकती है.





