पटना : बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ‘स्वेच्छा से’ राज्यसभा जाने की घोषणा के बाद उनके जदयू कार्यकर्ताओं का शुरू हुआ बवाल फिलहाल थम गया है, किन्तु पार्टी के अंदर व्याप्त निस्तब्धता, पता नहीं क्यों, बड़े तूफान से पूर्व की डरावनी शांति जैसी महसूस हो रही है. प्रदेश में नयी सरकार के गठन को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा तो नहीं हुई है, किन्तु अंदरखाने से आ रही खबरों की मानें तो दूसरी पारी में मुख्यमंत्री भाजपा का ही होगा. हालांकि भाजपा में कौन संभालेगा प्रदेश की कमान, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है, लैकिन कई नाम हवा में तैर रहे हैं, और उन नामधारी नेताओं के समर्थक लॉबीइंग में जुट भी चुके हैं अपनी-अपनी तरह से. खबर यह भी आ रही है के भाजपा एवं जदयू के बीच पदों की अदला-बदली पर सहमति बन गई है, यानी नीतीश सरकार में जिन विभागों की जिम्मेवारी जदयू के मंत्रियों के पास थी, वे सभी विभाग नयी सरकार में भाजपा कोटे के मंत्रियों को सौंप दिये जाएंगे. इसके स्थान पर भाजपा कोटे के मंत्रियों के पास जितने विभाग थे, उन सभी विभागों की जिम्मेवारी जदयू कोटे के मंत्रियों को सौंप दी जाएगी. नीतीश सरकार में उप मुख्यमंत्री भाजपा के थे तो नयी सरकार में उप मुख्यमंत्री का पद जदयू के कोटे में चला जाएगा. हालांकि इसकी भी अब तक आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है.(नीचे भी पढ़ें)
खैर, यह तो है राज्य में सत्ता परिवर्तन का सामान्य फॉर्मूला, जिसको लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं, किन्तु सूत्र एनडीए की इन दोनों ही पार्टियों में अंदरखाने कुछ और जोड़-घटाव की आहट भी राजनीतिक विश्लेषक सुनने कोशिश कर रहे हैं. राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता, तेजस्वी यादव इसकी आशंका पहले ही जता चुके हैं कि भाजपा ने जदयू से आजाद होने का फॉर्मूला तैयार कर लिया है और नीतीश कुमार उसके इस प्लान के शिकार भी हो चुके हैं. कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार के दिल्ली जाने के बाद प्रदेश में पार्टी का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा. नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की खबर आने के बाद जदयू कार्यकर्ताओं के हंगामे के दौरान पार्टी के जिन नेताओं के खिलाफ नारे लगे, इस आहट के पीछे उन नेताओं को ही जिम्मेवार बताया जा रहा है. बताया जा रहा है कि उन नेताओं की भाजपा के साथ बढ़ी नजदीकियों से इन कयासों को और हवा मिल रही है. बताया जा रहा है कि नीतीश कुमार के दिल्ली जाने के बाद पार्टी में फूट पड़ सकती है और पार्टी विधायकों का एक बड़ा हिस्सा खुद को अलग घोषित कर भाजपा में भी जा सकता है. अगर बिहार एनडीए से जदयू अलग हो जाए एनडीए के बाकी घटक दलों के विधायकों की संख्या बहुमत से करीब पांच-छह कम रह जाएगी. नीतीश कुमार के समर्थन में हंगामा करने वाले जदयू कार्यकर्ताओं के पीछे खड़े पार्टी विधायक प्रभावी रहे तो वर्तमान एनडीए सरकार के अल्पमत में आ जाएगी और राजद विधायक दल के नेता तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार के साथ जिस अंदाज में अन्याय होने की बात कही, उससे उनके ऐसे ही मौके के इंतजार की बात कही जा रही है, ताकि एनडीए सरकार को सत्ता से दूर करने की कल्पना साकार हो सके. (नीचे भी पढ़ें)
विधानसभा में दलीय स्थिति पर ध्यान दें तो जदयू एवं वर्तमान विपक्षी सारे दलों के एकजुट होने की स्थिति में ऐसा होना असंभव भी नहीं होगा. किन्तु पटना में राजनीति के जानकार बताते हैं कि भाजपा भी इस आशंका से पूरी तरह वाकिफ है और उसके अंदरखाने इससे निपटने के लिए पूरी तरह तैयार होने की बात भी बताई जा रही है. बताया जा रहा है कि ऐसी स्थिति आने से पूर्व ही जदयू में विद्रोह हो सकता है और जदयू विधायकों का एक वर्ग खुद को अलग कर भाजपा के साथ होकर सरकार में शामिल हो सकता है. हालांकि जदयू के बागियों के लिए ऐसा कर पाना बहुत आसान नहीं होगा. विधानसभा में जदयू के कुल 85 सदस्यों के विधायक दल से अलग होने के लिए कम से कम 66.66 फीसदी (लगभग 57) विधायकों को एकजुट करना बहुत आसान नहीं होगा. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजनीति असंभव को संभव बनाने का ही खेल है, और भाजपा इस खेल की माहिर खिलाड़ी बन चुकी है. जानकार बता रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी बिहार में बिसात बिछा चुके हैं और उनके मोहरे अपने काम में जुट भी चुके हैं.







