नई दिल्ली : भारत में सेक्स एजुकेशन को लेकर चली आ रही झिझक या रोक अब खत्म हो सकती है, क्योंकि इस विषय को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की तैयारी शुरू हो गई है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह इस संबंध में गठित एक कमेटी की सिफारिशों के अनुसार स्कूल/कॉलेजों में कंप्रिहेंसिव सेक्स एजुकेशन शुरी करने को तैयार है. कोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद इसे लागू किया जा सकता है. (नीचे भी पढ़ें)
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना एवं न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ के समक्ष प्रस्तुत हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सरकार ने कमेटी की रिपोर्ट स्वीकार कर ली है और इसे पूरे देश में लागू किया जाएगा. बताते चलें कि उक्त रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का पालन करने के लिए दाखिल की गई है, जिसमें नाबालिग बच्चियों के गर्भवती होने या किशोरों के बीच सहमति से बने प्रेम संबंधों के मामलों को पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध मानने से रोकने के तरीकों पर विचार करने को कहा गया था. (नीचे भी पढ़ें)
केंद्र सरकार ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव की अध्यक्षता में एक 26 सदस्यीय राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति गठित की थी, जिसे आपसी सहमति से यौन संबंध बनाने वाले किशोरों की निजता के अधिकार से जुड़े मुद्दों की विशेष रूप से पॉक्सो एक्ट के संदर्भ में जांच का काम सौंपा गया था. टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के विशेषज्ञों, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट्स, विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों, एनसीपीसीआर एवं एनएलएसए के प्रतिनिधियों को मिलाकर गठित समिति ने सुझाव दिया कि स्कूलों में कॉम्प्रिहेंसिव सेक्स एजुकेशन और बच्चों के यौन शोषण जैसे विषयों को मुख्य सिलेबस का हिस्सा बनाया जाए. (नीचे भी पढ़ें)
पैनल ने कहा कि सुरक्षा, शरीर के अंगों और स्वच्छता की बुनियादी बातें और सुरक्षित-असुरक्षित स्पर्श जैसी अवधारणाओं को शुरुआती स्तर (फाउंडेशनल स्टेज) से ही शामिल किया जा सकता है. समिति ने एनसीईआरटी से उक्त सिलेबस तैयार कराने की सिफारिश की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि किशोर शिक्षा को एनईपी 2020 के अनुरूप स्कूलों और कॉलेजों में लागू किया जाना चाहिए. इसमें कहा गया कि किशोर शिक्षा के वर्तमान कार्यक्रमों की समीक्षा की जा सकती है और उनमें सुधार किये जा सकते हैं. इन कार्यक्रमों में सुरक्षा और बचाव की चिंताओं के साथ-साथ उम्र के हिसाब से कॉम्प्रिहेंसिव सेक्स एजुकेशन के पहलुओं के बारे में जागरूकता को शामिल किया जाना चाहिए. रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि प्राइमरी स्कूल के स्तर से ही, एक समर्पित विशेषज्ञ शिक्षक नियुक्त किया जाना चाहिए और इन विषयों पर कक्षाएं अनिवार्य रूप से सप्ताह में कम से कम दो बार, 15-20 मिनट के लिए आयोजित की जानी चाहिएं. माता-पिता, अभिभावकों और शिक्षकों के लिए विशेष बैठकें आयोजित की जानी चाहिए ताकि उन्हें बच्चों के विकास और सेक्स एजुकेशन के महत्व के बारे में जानकारी दी जा सके.







