जमशेदपुर : जमशेदपुर के दलमा फॉरेस्ट गेस्ट हाउस के समीप स्थित कोंकाधासा गांव में रविवार शाम वज्रपात की चपेट में आने से दो आदिवासी किशोर दीपक सिंह (15) और फतू सिंह (17) गंभीर रूप से घायल हो गए. दोनों बेहोशी की हालत में थे, लेकिन समय पर एंबुलेंस नहीं मिलने के कारण परिजनों और ग्रामीणों को उन्हें बाइक से करीब 30 किलोमीटर दूर एमजीएम अस्पताल पहुंचाना पड़ा. ग्रामीणों के अनुसार, घटना के बाद 108 नंबर पर लगातार फोन कर एंबुलेंस की मांग की गई. करीब आधे घंटे तक रांची स्थित सेवा केंद्र से बातचीत होती रही. ग्रामीणों ने आग्रह किया कि यदि एंबुलेंस कोंकाधासा गांव तक नहीं पहुंच सकती है तो कम से कम दलमा की तलहटी में स्थित बोंटा गांव तक भेज दी जाए. योजना थी कि घायलों को किसी तरह बाइक से बोंटा तक पहुंचाया जाएगा और वहां से एंबुलेंस द्वारा एमजीएम अस्पताल ले जाया जाएगा. हालांकि, एंबुलेंस उपलब्ध नहीं होने की जानकारी दी गई. (नीचे भी पढ़ें)
आखिरकार थक-हारकर ग्रामीणों ने दोनों गंभीर घायलों को बाइक से ही पहाड़ी क्षेत्र से नीचे उतारा और करीब 30 किलोमीटर का सफर तय कर एमजीएम अस्पताल पहुंचाया. गांव के मंगल सिंह ने बताया कि गंभीर स्थिति में भी समय पर सरकारी एंबुलेंस नहीं मिलना बेहद चिंताजनक है. इस घटना ने जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की वास्तविक स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं. झारखंड के ग्रामीण और दुर्गम इलाकों में मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए अक्सर वैकल्पिक साधनों का सहारा लेना पड़ता है. कई बार खटिया पर मरीज को ढोकर अस्पताल पहुंचाने की तस्वीरें सामने आती हैं तो कभी बाइक और निजी वाहन ही ग्रामीणों का एकमात्र सहारा बन जाते हैं. कोंकाधासा गांव से दोनों घायलों को लेकर पहाड़ी से उतरने के दौरान खराब और कच्चे रास्ते के कारण बाइक दो बार दुर्घटनाग्रस्त हो गई. बाइक चालक राकेश कुमार ने बताया कि वह रविवार को गांव के कुछ मजदूरों को मजदूरी की राशि देने पहुंचे थे. इसी दौरान वज्रपात की घटना हो गई. (नीचे भी पढ़ें)
उन्होंने बताया कि एंबुलेंस नहीं मिलने पर वन विभाग की कच्ची सड़क से अपनी बाइक पर दोनों घायलों को बैठाकर बोंटा गांव तक उतारा. सफर काफी जोखिम भरा और जानलेवा था. इसके बाद किसी तरह दोनों को एमजीएम अस्पताल पहुंचाया गया, जहां रात करीब 10 बजे दोनों घायलों को पांचवें तल्ले स्थित आईसीयू में भर्ती कराया गया. रविवार को ही बोड़ाम के लावजोड़ा निवासी श्रीमति गोराई को प्रसव पीड़ा शुरू हुई. परिजन उन्हें गांव की एक गाड़ी से स्थानीय माचा अस्पताल ले गए, जहां नर्स ने बताया कि वहां डिलीवरी संभव नहीं है. इसके बाद परिजनों ने 108 और 102 एंबुलेंस सेवा पर फोन किया. परिजनों का आरोप है कि काफी देर बाद 108 सेवा से बताया गया कि एंबुलेंस उपलब्ध नहीं है और गाड़ी आने में तीन से चार घंटे लग सकते हैं. इसके बाद अस्पताल परिसर में चस्पा ममता वाहन के नंबर पर भी संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन काफी कोशिश के बावजूद नंबर नहीं लगा. अंततः परिजनों ने निजी गाड़ी की व्यवस्था की और महिला को एमजीएम अस्पताल पहुंचाया. महिला के पति प्रशांत गोराई ने बताया कि वह एक छोटी दुकान चलाते हैं और आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं है, लेकिन किसी तरह निजी गाड़ी की व्यवस्था कर पत्नी को अस्पताल लेकर आए. उन्होंने कहा कि 108, 102 और ममता वाहन की व्यवस्था इतनी खराब है कि यदि किसी मरीज के पास निजी गाड़ी का खर्च उठाने के लिए पैसे नहीं हों तो उसकी जान भी जा सकती है. जिले में एंबुलेंस नहीं मिलने की कई घटनाएं पहले भी सामने आ चुकी हैं. शनिवार को जुगसलाई की एक गर्भवती महिला को एंबुलेंस नहीं मिलने पर ऑटो से अस्पताल लाना पड़ा था. (नीचे भी पढ़ें)
इस दौरान एमजीएम अस्पताल पहुंचने पर महिला का अस्पताल के बाहर ऑटो में ही प्रसव हो गया था. करीब एक माह पहले भी एंबुलेंस नहीं मिलने के कारण एक महिला का प्रसव एमजीएम अस्पताल के गेट के पास निजी वाहन में ही हो गया था. लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं से आपातकालीन एंबुलेंस सेवा की व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं. गौरतलब है कि करीब एक माह पूर्व पटमदा में समय पर एंबुलेंस नहीं मिलने के कारण एक व्यक्ति की असामयिक मौत का मामला सामने आया था. इस संबंध में पटमदा थाना में प्राथमिकी भी दर्ज की गई थी. मामले को गंभीरता से लेते हुए जिले के सिविल सर्जन ने 108 एंबुलेंस सेवा को दुरुस्त करने का निर्देश दिया था. इसके बावजूद ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में एंबुलेंस सेवा की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं होने के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं. “108 एंबुलेंस की व्यवस्था रांची से संचालित होती है. यहां जो एंबुलेंस खराब हैं, उन्हें ठीक कराया जा रहा है. ऐसी परिस्थिति में स्वास्थ्य केंद्र के माध्यम से मुझे सूचना दी जाए तो स्थानीय स्तर पर कोई न कोई वैकल्पिक इंतजाम कराया जाएगा.




