जमशेदपुर : सुप्रीम कोर्ट ने ने सिविल अपील संख्या 14604 और 14605 – राजेंद्र कुमार बरजात्या और राजीव गुप्ता बनाम यूपी आवास निगम मामले में अपने 17 दिसंबर 2024 के आदेश द्वारा यह व्यवस्था दी कि म्युनिसिपल कमीश्नर यह सुनिश्चित करें कि बिल्डिंग बाईलॉज के अनुसार नक्शा पारित कर भवन निर्माण की परमिट जारी करने से पहले बिल्डर यह शपथ-पत्र दें कि वे बिल्डिंग, फ्लोर या फ्लैट को बगैर कम्पलीशन और ओकुपेंसी सर्टिफिकेट के किसी को ना तो सौंपे ना बेचें. सुप्रीम कोर्ट ने अपने उक्त आदेश की प्रतियों को देश के सारे मुख्य सचिवों को इस हिदायत के साथ भिजवाया था कि उनके उक्त आदेश की तामिला हो पर झारखंड के मुख्य सचिव ने उक्त आदेश को झारखंड में पूरी अवहेलना की गयी. ज्ञातव्य है कि जमशेदपुर में पिछले 20 सालों में लगभग 2000 भवनों को निर्माण के लिए जमशेदपुर अक्षेस (जेएनएसी) द्वारा नक्शा और परमिट जारी किया गया है पर इन 20 वर्षों सिर्फ 28 कम्पलीशन और ओकुपेंसी सर्टिफिकेट ही जारी किये गये हैं. ज्ञातव्य यह भी है कि जेएनएसी ने 650 से अधिक बिल्डरों को कारण पृच्छा नोटिस तामिल किया पर किसी पर कोई आदेश पिछले 15 सालों में पारित नहीं किया. (नीचे भी पढ़ें)
अक्षेस ने उन कारण पृच्छा नोटिसों पर आदेश पारित कर उन अवैध भवनों पर कार्रवाई इसलिए नहीं की कि अगर जमशेदपुर अक्षेस आदेश पारित करती तो उसे अवैध निर्माण को तोड़कर उक्त भवन को कम्पलीशन और ओकुपेंसी सर्टिफिकेट जारी करना पड़ता. पर बिल्डर उन अवैध भवनों ने अवैध पैसे कमा रहे हैं और अक्षेस के अधिकारियों को उसमें उनका हिस्सा दे रहे हैं इसलिए अक्षेस के कमीश्नरों ने पिछले 15 सालों में कारण पृच्छा नोटिसों पर एक भी आदेश पारित नहीं किया न अवैध बने बिल्डिंगों पर कार्रवाई की और जमशेदपुर में अक्षेष के कमीश्नर और अधिकारियों ने अवैध बिल्डिंगों को अपनी लगातार होने वाली अवैध कमाई का जरिया बना लिया है. अक्षेस के इस अवैध धंधे और सर्वोच्च न्यायालय के उक्त आदेश की अवहेलना करने के खिलाफ एक अरुण कुमार सिंह ने उच्च न्यायालय में एक पीआईएल दायर किया. उच्च न्यायालय ने पिटीशनर के अधिवक्ताओं अखिलेश श्रीवास्तव और नेहा अग्रवाल की दलीलों को सुनने के बाद यह व्यवस्था दी कि पिटीशनर जमशेदपुर या पूरे झारखंड में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अवहेलना करने वाले कुछ कतिपय बिल्डिंगों को पार्टी बनाकर उक्त पीआईएल को फिर से दायर कर सकते हैं.







