चाकुलिया: भारतीय संस्कृति में गौ माता को सर्वश्रेष्ठ और अत्यंत पवित्र माना गया है. आयुर्वेद में गाय से प्राप्त पंचगव्य दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का विशेष महत्व है. इसी परंपरा और पर्यावरण संरक्षण के संकल्प को दोहराते हुए चाकुलिया नया बाजार स्थित कोलकाता पिंजरापोल सोसायटी गौशाला में इन दिनों होलिका दहन की तैयारियां जोरों पर हैं. वर्तमान में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए गौशाला प्रबंधन ने गोबर के उपलों के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया है.
गौशाला में इन दिनों गोबर से उपलों का निर्माण कार्य चल रहा है. गौशाला कर्मी सागर धल की देखरेख में लगभग 10 मजदूर दिन-रात देसी गाय के गोबर से उपले और अन्य पारंपरिक आकृतियां बनाने में जुटे हैं. इस पहल का मुख्य उद्देश्य होलिका दहन के दौरान लकड़ी के स्थान पर गोबर के उपलों के उपयोग को बढ़ावा देना है. (नीचे भी पढ़ें)
आयुर्वेद के अनुसार गोबर के जलने से निकलने वाला धुआं वातावरण में फैले हानिकारक जीवाणुओं और कीटाणुओं को नष्ट कर पर्यावरण को स्वच्छ बनाता है. गौशाला के प्रबंधक वीरेंद्र गिरि ने बताया कि इस बार उपलों की भारी डिमांड देखी जा रही है. अब तक कोलकाता और विशाखापत्तनम जैसे बड़े शहरों से भारी मात्रा में ऑर्डर प्राप्त हो चुके हैं. मांग को पूरा करने के लिए पैकिंग का काम भी तेजी से किया जा रहा है. गौशाला द्वारा तैयार किए गए एक पैकेट उपले का मूल्य 300 रुपये रखा गया है. इस पैकेट में देसी गाय के गोबर से निर्मित होला, होलिका, ढाल, खड़ाऊं, नारियल, पान पत्ता, सुपारी, चांद-सूरज, तारा, चकला-बेलन, तावा-कड़ाही, बड़कुल्ला, हल्दी और धागा जैसे पारंपरिक आइटम शामिल किए गए हैं. विदित हो कि चाकुलिया गौशाला की इस पहल से न केवल प्राचीन परंपराओं का संरक्षण हो रहा है. बल्कि समाज को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का एक बड़ा संदेश भी मिल रहा है.



