जमशेदपुर : कर विचार में कौन हूं? मैं कौन हूं, कहां से आया, लक्ष्य क्या है, जाना कहां है. विहंगम योग के संत विज्ञान देव जी ने अपने प्रवचन के दौरान यह प्रश्न किया. उन्होंने कहा, जो शाश्वत है, नित्य है, वह आत्मा है, लेकिन हम उधर कहां देख रहे हैं. हम तो बाहर ही देख रहे हैं, सिर्फ बाहर के दृश्य को ही देख रहे हैं. हमारी ज्ञानेंद्रियों के पांच विषय सब अपना-अपना काम कर रहे हैं उनके विषय भी बाहर के ही हैं. (नीचे भी पढ़ें)

उन्होंने पूछा- इस नश्वर शरीर का आधार क्या है, इस जड़ शरीर का चेतन आधार क्या है. यह तो अंतर्यात्रा का विषय है. हम नित्य हैं, सनातन हैं, लेकिन खुद को कितना जानते हैं? उन्होंने कहा, जीवन के प्रवाह में हम बहे जा रहे हैं. जितना आवश्यक ज्ञान सामाजिक व्यापार का है वह होना चाहिए, लेकिन अंतर की यात्रा भी आवश्यक है. (नीचे भी पढ़ें)
उन्होंने कहा कि जीव विभिन्न शरीरों में भटकता जा रहा है. यह जीवन क्या है? जीवन का सत्य क्या है? वह इस शरीर में स्थित है प्राणों का भी प्राण है. आत्मा के अंदर स्थित है वही सत्ता जीवन का आधार है, वह परमात्मा है. वह आनंद स्वरूप है. हम शांति चाहते हैं, कामनाओं की पूर्ति चाहते हैं, लेकिन आत्मज्ञान के प्रति सजग नहीं हैं. हमारा जीवन निरंतर कार्यों के प्रवाह के साथ बढ़ता जा रहा है और प्रतिफल के रूप में उपस्थित हो रहा है. हम उऋण नहीं हो सकते, और यह चक्र चलता रहता है. उन्होंने ऋषियों की उक्ति दोहराई – यदि आत्मज्ञानी नहीं हो सकते तो दुनिया भर के ज्ञान को हासिल करने का क्या उद्देश्य है और इसमें जीवन की सार्थकता कैसे है. आध्यात्मिक चिंतन की आवश्यकता है. मैं कौन हूं, कहां से आया, कहां जाना है और इसके लिए साधना योग के पथ पर चलना होगा.





