
जमशेदपुर : आदिवासी समुदाय के प्रख्यात शिक्षाविद पद्मश्री से सम्मानित प्रोफेसर दिगंबर हांसदा का गुरुवार की सुबह न निधन हो गया. वे 73 साल के थे. भारतीय संविधान का संथाली भाषा में अनुवाद करने के लिए उनको जमशेदपुर ही नहीं बल्कि पूरा झारखंड याद करेगा. इसके अलावा वे आदिवासी बहुल करणडीह एरिया में एलबीएसएम कॉलेज के संस्थापक सदस्यों में से एक थे, जिनके लिए उनको याद किया जाता रहेगा. स्वर्गीय दिसंबर हांसदा अपने पीछे दो बेटे और दो बेटियों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गये है. उनकी पत्नी पार्वती हांसदा का निधन कुछ साल प हले हो गयी थी. उनकी एक बेटी तुलसी हांसदा की भी मौत हो चुकी थी. आदिवासियों की हासा और भाषा के उत्थान के लिए उन्होंने काफी बेहतर काम किया है. वे केंद्र सरकार के आदिवासी अनुसंधान संस्थान के सदस्य रह चुके है जबकि उन्1होंने सिलेबस की किताबों का संथाली भाषा में अनुवाद किया है. राज्य सरकार के अधीन इंटर, स्नातक और स्नातकोत्तर के लिए संथाली भाषा का कोर्स संग्रह का काम भी वे कर चुके है. 1939 को करणडीह से सटे बेको क्षेत्र के देवोपानी गांव में उनका जन्म हुआ था. उन्होंने सरना के गद्य और पद्य संग्रह, भारोतेर, लौकिक देव-देवी, गंगमाला, संथाली लोककथा संग्रह कर चुके थे. उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजदोहा मध्य विद्यालय में हुई जबकि मानपुर हाई स्कूल से उन्होंने पढ़ाई पूरी की. राजनीतिक शास्त्र में उन्होंने स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की. (नीचे पढ़े प्रोफेसर हांसदा के निधन से जुड़ी खबरें.)

मुख्मुयमंत्री हेमंत सोरेन ने जताया शोक (नीचे पढ़े प्रोफेसर हांसदा के निधन से जुड़ी खबरें.)
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने शिक्षाविद पद्मश्री प्रो दिगम्बर हांसदा के निधन पर दुःख व्यक्त किया है. मुख्यमंत्री ने कहा कि संताली भाषा को विश्व पटल पर ले जाने में हांसदा जी का अभूतपूर्व योगदान रहा है. उनका निधन शिक्षा और साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति है. परमात्मा उनकी आत्मा को शांति प्रदान कर परिवार को दुःख की इस घड़ी को सहन करने की शक्ति दें. (नीचे पढ़े प्रोफेसर हांसदा के निधन से जुड़ी खबरें.)

पूर्व सीएम रघुवर दास ने कहा-प्रोफेशर हांसदा के शिक्षा में योगदान को भुलाया नहीं जा सकता, राजकीय सम्मान के साथ हो अंतिम संस्कार
राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवर दास ने जाने-माने शिक्षाविद, लेखक एवं समाजसेवी प्रोफेसर दिगम्बर हांसदा के निधन पर गहरा शोक प्रकट किया है. उन्होंने कहा है कि प्रो हांसदा एक मृदुभाषी एवं मिलनसार व्यक्ति थे. शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है. प्रो हांसदा के कृतित्व एवं व्यक्तित्व को देखते हुए श्री दास ने सरकार से इन्हें राजकीय सम्मान प्रदान करने की स्थानीय स्तर की जा रही मांग का समर्थन किया है. उन्होंने बताया कि संथाली भाषा एवं साहित्य के विकास में इनका काफी योगदान रहा है. हिन्दी एवं संथाली भाषा में इनकी कई पुस्तकें हैं. भारतीय संविधान का इन्होंने संथाली में अनुवाद किया है. इंटरनेशनल संथाल काउंसिल के संस्थापक चेयरमैन एवं गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू मेमोरियल ट्रस्ट के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में इन्होंने काफी काम किया है. जमशेदपुर के आदिवासी क्षेत्र में पहला कॉलेज खोलने का श्रेय भी प्रो हांसदा को जाता है.

वे जमशेदपुर स्थित लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज के संस्थापक सदस्य थे. उनके निधन से शिक्षा जगत को भारी क्षति हुई है. श्री दास ने अपने शोक संदेश में कहा है कि झारखंड के विकास के इस दौर में हमें आज इनकी जरूरत थी, लेकिन असमय यह हमारे बीच से चले गये. मृत्यु पर आदमी का वश नहीं चलता है, हानि-लाभ जीवन-मरण, यश-अपयश ऊपर वाले के हाथ में है. ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें तथा इनके निधन से मर्माहत परिजनों को दु:ख सहने की शक्ति दें. पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने पद्मश्री सम्मान से विभूषित शिक्षाविद् प्रो दिगम्बर हांसदा की अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ कराने का आग्रह राज्य के मुख्य सचिव सुखदेव सिंह से किया है. उन्होंने प्रो हांसदा के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में दिए गए योगदान की सराहना करते हुए उनका (प्रो. हांसदा का) अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान से करने की जोरदार सिफारिश की है.







