बोकारो:रंगों का त्योहार होली में अब तक मिलावट भरे रंगों से होली होती रही है. मगर पहली बार मिलावट के रंगों से दूर प्राकृतिक रंगों के सत्य से अवगत होंगे. जहां झारखंड के ग्रामीण बोकारो से दूर सुदूर गांव में प्लास के फुल से रंग बना अपने जीवन में होली का रंग भर होली मनाते है.भारतीय संस्कृति में होली अपनी खुशियों को एक दुसरे से बांटने के लिए खेली जाती है. मगर इस रंगों के त्योहार में अगर आपका चेहरा या आंखें रोग ग्रसित हो जाए तो क्या जीवन के रंग में खलल नहीं पहुंचेगा. हम बात कर रहे है मिलावट के रंगों की जो आज बाजारों में खुलेआम बिकती है.(नीचे भी पढ़े)

लाल, पीले,गुलाबी, हरे और बुलू रंगों में कुछ लोग ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए पक्के और गहरे रंगों का दावा कर बाजार में बहुत आराम से बेचते है जो देखने में खुबसूरत तो होता है मगर जान लेवा है. जिससे अलग बोकारो जिला के नावाडीह, गोमिया के ग्रामीण जंगल में प्रकृति की शोभा बढ़ा रही पलास के फुल तोड़ शीलपट पर पिस बोतलों में भर रंग बनाते है. जिसमें ग्रामीणों का मेहनत का भी रंग होता है. जिसे बाजारों में भी अपने जीवन यापन के लिए भी बेचते है. मगर बाजारों में मिलने वाले रंगों से सौ गुना ज्यादा लाभदायक होता है. जिसे इस्तमाल करने के बाद चेहरा और आंख को कोई नुकसान नहीं होता. जिसमें यह कार्य पहाड़ों और जंगलों के बीच रहने वाले ग्रामीण ज्यादा करते हैं. (नीचे भी पढ़े)

जहां पहाड़ों से पलास का फूल तोडना और उसे रंग बनाना उनकी मजबूरी नहीं बल्कि उनका उत्साह है जो रंगों को बनाते समय दिखता है. ग्रामीण महिला सावित्री का कहना है हम पहले जंगलों में जाकर लाल पलास के फुल गांव लाते है और उसे पिस कर पानी में मिला रंग का रूप देते है. जिसमें उनकी मेहनत के साथ अपने ईमानदारी भी जुड़ा रहता है. होली पर्व में लोगों को प्राकृतिक रंग मिल सके और लोगों का चेहरा खराब ना हो और ना ही आंखों को नुकसान हो इसका ख्याल रहते हुए इसे बनाया जाता है. होली पर्व में केमिकल वाली रंगों से दूर जंगलों और पहाड़ों की प्राकृतिक रंगों वाली होली ग्रामीणों की होली खास है. चकाचौंध भरी कॉस्मेटिक होली से दूर प्राकृतिक होली मनाने के साथ अपनी परंपराओं को भी जीवंत रखते हैं यहां लोग.




