नई दिल्ली : उच्च शिक्षा के क्षेत्र में झारखंड भले पिछड़ा हो, लेकिन प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में इसने उत्साहजनक उपलब्धि हासिल की है. राज्य को प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है. राज्य ने प्राथमिक स्कूलों में शून्य ड्रॉप आउट करने का लक्ष्य हासिल कर लिया है. हाल ही नीति आयोग की ओर से देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर जारी रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हुई है. रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014-15 में राज्य में राज्य में प्राथमिक स्तर पर ड्रॉप आउट की दर 6.41 पीसदी थी, जो वर्ष 2024-25 में घट कर शून्य पर आ गई है. (नीचे भी पढ़ें)
बताते चलें कि किसी भी देश के संपूर्ण विकास के लिए उसकी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर होती है. विकसित भारत का सपना साकार करने के लिए भी मजबूत शिक्षा व्यवस्था से ही साकार हो सकता है. इसके लिए जरूरी है कि देश का एक-एक बच्चा विद्यालय पहुंचे ही नहीं, बल्कि नियमित रूप से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी भी करे. इसीलिए देश में अब शत प्रतिशत नामांकन ही नहीं, बच्चों के सौ फीसदी ठहराव एवं शून्य ड्रॉप आउट पर विशेष रूप से ध्यान दिया जा रहा है. (नीचे भी पढ़ें)
नीति आयोग की हाल में आई रिपोर्ट के अनुसार विगत दस वर्षों में झारखंड में शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर ड्रॉप आउट की दर 6.41 फीसदी से घट कर शून्य हो गई है. यही नहीं, माध्यमिक स्तर पर भी ड्रॉप आउट की दर 23.2 प्रतिशत से घट कर सिर्फ 3.5 फीसदी रह गई है. प्रदेश की यह उपलब्धि सिर्फ झारखंड के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा का विषय है. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी प्रत्येक बच्चे को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने एवं उसे विद्यालय में बनाये रखने पर खास जोर दिया गया है. इसके बावजूद पूरे देश में स्कूलों से बच्चों का ड्रॉप आउट गंभीर समस्या बना हुआ है. अगर सकल नामांकन अनुपात यानी जीईआर के आंकड़ों की बात करें तो यह और बड़ी चिंता का विषय लगता है, कक्षा छह से आठ तक जीईआर लगभग 90.9 फीसदी है, जबकि कक्षा 9-10 में यह घट कर 79.3 प्रतिशत है, जो कक्षा 11-12 तक आते-आते मात्र 56.5 प्रतिशत ही रह जाता है. इसका मतलब साफ है कि बड़ी संख्या में बच्चे, खास कर कक्षा 8 के बाद शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं. यह स्थिति शिक्षा के साथ-साथ देश के सामाजिक और आर्थिक विकास से भी सीधे जुड़ी है.







