जमशेदपुर : आज कारगिल विजय दिवस है. इस अवसर पर जमशेदपुर के तीन रणबांकुड़ों ने बहादूरी को जानिए. जमशेदपुर के बिरसानगर निवासी नवेंदु गांगुली ने गुलमोहर हाई स्कूल से अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की. सितंबर 1989 में उनका चयन भारतीय नौसेना में हुआ. उनकी पहली पोस्टिंग मुंबई स्थित आईएनएस राणा पर हुई, जो भारतीय नौसेना का एक शक्तिशाली विध्वंसक युद्धपोत है. यह जहाज थल से थल और थल से वायु में मिसाइल दागने की क्षमता रखता है तथा नौसेना की फर्स्ट लाइन ऑफ अटैक का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. नवेंदु गांगुली ने जहाज के एक्जीक्यूटिव ब्रांच के नेविगेशन विभाग में अपनी सेवाएं दीं. उनकी जिम्मेदारी युद्धपोत का सुरक्षित संचालन, नौचालन, दिशा-निर्देशन तथा रडार और ऑपरेशनल सिस्टम के माध्यम से दूर स्थित लक्ष्यों की पहचान करना था. अत्याधुनिक रडार की मदद से वे ऐसी वस्तुओं का भी पता लगा लेते थे जो सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देती थीं. उनका मानना है कि “ठंड में बिस्तर पर रहकर देशभक्ति की बातें करना आसान है, लेकिन मुल्क की हिफाजत का असली एहसास सरहद और समुद्र की लहरों पर ड्यूटी निभाने से होता है. ” (नीचे भी पढ़ें)

ऑपरेशन ताशा में निभाई अहम भूमिका
नवेंदु गांगुली को भारतीय नौसेना के ऑपरेशन ताशा में शामिल होने का अवसर मिला. इस अभियान के तहत उनकी विशेष तैनाती तमिलनाडु के रामेश्वरम स्थित धनुषकोडी क्षेत्र में की गई, जहां से श्रीलंका का समुद्री तट काफी निकट है. उस समय लिट्टे की गतिविधियों पर नजर रखने और समुद्री घुसपैठ रोकने के लिए भारतीय नौसेना लगातार गश्त करती थी. करीब एक वर्ष तक चली इस विशेष ड्यूटी के दौरान वे तीन अन्य नौसैनिकों के साथ छोटी नावों से समुद्र में गश्त करते थे. धनुषकोडी क्षेत्र में समुद्र की गहराई कम होने के कारण बड़े युद्धपोत नहीं चल सकते थे, इसलिए छोटी नौकाओं के माध्यम से निगरानी की जाती थी. वे बताते हैं कि एलटीटीई के उग्रवादी अक्सर अन्य नावों को कब्जे में लेने या समुद्री रास्ते से आवाजाही का प्रयास करते थे. भारतीय नौसेना की सतर्कता के कारण कई संदिग्ध नौकाओं, तस्करों और घुसपैठियों को पकड़ा गया. नौसेना की मौजूदगी की जानकारी मिलते ही एलटीटीई के सदस्य अक्सर तट छोड़कर भाग जाते थे.
ऑपरेशन विजय के दौरान भी निभाई जिम्मेदारी : नवेंदु गांगुली ने बाद में आईएनएस कुकरी पर भी अपनी सेवाएं दीं. इसी दौरान उन्हें ऑपरेशन विजय का हिस्सा बनने का अवसर मिला. उनकी तैनाती गुजरात तट के समुद्री क्षेत्र में थी, जहां वे लगातार समुद्री गश्त कर देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में जुटे रहे. लगभग दो दशकों की अपनी नौसैनिक सेवा के दौरान नवेंदु गांगुली ने समुद्री सुरक्षा, तटीय निगरानी और राष्ट्र की रक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया. उनका सैन्य जीवन इस बात का प्रमाण है कि भारतीय नौसेना के जवान हर परिस्थिति में समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के लिए पूरी निष्ठा और साहस के साथ तत्पर रहते हैं. (नीचे भी पढ़ें)

30 चोटियों को पाकिस्तानियों से कराया मुक्त : बिरजू कुमार
जमशेदपुर के गोविंदपुर निवासी हवलदार बिरजू कुमार ने 30 दिसंबर 1995 को भारतीय थल सेना में भर्ती होकर राष्ट्र सेवा का संकल्प लिया. एयर डिफेंस कोर के सदस्य के रूप में उन्होंने देश की सीमाओं की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उन्हें उन वीर सैनिकों में शामिल होने का अवसर मिला, जिन्होंने दुर्गम पहाड़ों पर बैठे पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने में साहस और पराक्रम का परिचय दिया. बिरजू कुमार बताते हैं कि युद्ध क्षेत्र में पहुंचने से पहले भारतीय सेना ने करगिल के कठिन भौगोलिक हालात, दुश्मन की रणनीति और ऊंची चोटियों की स्थिति का गहन अध्ययन किया. इसी सुनियोजित रणनीति और अदम्य साहस के बल पर भारतीय सैनिकों ने एक-एक कर दुश्मन के कब्जे वाली चोटियों पर धावा बोला. उन्होंने भी अपने साथियों के साथ पूरे जोश, जुनून और अनुशासन के साथ अभियान में हिस्सा लिया. इस दौरान 30 से अधिक महत्वपूर्ण चोटियों से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़कर उन पर पुनः तिरंगा फहराया गया. वे बताते हैं कि ऊंची बर्फीली चोटियों पर लड़ाई लड़ना बेहद कठिन था. ऑक्सीजन की कमी, कड़ाके की ठंड, दुर्गम रास्ते और दुश्मन की लगातार गोलाबारी के बावजूद भारतीय सैनिकों का मनोबल कभी नहीं डगमगाया. हर सैनिक के मन में केवल एक ही लक्ष्य था—भारत की एक-एक इंच भूमि को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराना.
बिरजू कुमार का कहना है कि कारगिल विजय भारतीय सेना के अदम्य साहस, अनुशासन और रणनीतिक कौशल का प्रतीक है. आज भी वे उस युद्ध की स्मृतियों को गर्व के साथ याद करते हैं और युवाओं से राष्ट्रभक्ति, अनुशासन तथा देश सेवा की भावना अपनाने का आह्वान करते हैं. उनके अनुसार, भारतीय सैनिकों के शौर्य और बलिदान के कारण ही देश सुरक्षित है और कारगिल विजय दिवस हमें उन अमर वीरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है. (नीचे भी पढ़ें)

दोनों हाथ-पैर गंवाने के बाद भी बुलंद है माणिक वारदा का हौसला, कहते हैं- देश के लिए हर कुर्बानी मंजूर : माणिक वारदा
करगिल युद्ध की यादें आज भी बिहार रेजिमेंट के वीर जवान हवलदार माणिक वारदा के जेहन में ताजा हैं. युद्धभूमि में अपने दोनों हाथ और पैर गंवाने के बावजूद उनके हौसले में रत्ती भर भी कमी नहीं आई है. वह कहते हैं कि करगिल युद्ध उनके जीवन की ऐसी घटना है, जिसे वह आज भी कल की ही बात मानते हैं. दुश्मन के खिलाफ लड़ाई का हर दृश्य आज भी उनकी आंखों के सामने घूमता रहता है. माणिक वारदा के शरीर ने भले ही साथ छोड़ दिया हो, लेकिन देशभक्ति का जज्बा आज भी पहले जैसा ही है. वह कहते हैं कि भारतीय सैनिक के लिए राष्ट्रसेवा सबसे बड़ा सौभाग्य है. करगिल की पहाड़ियों पर दुश्मन से लोहा लेते हुए उन्हें गर्व महसूस हुआ कि उन्हें देश की रक्षा के लिए अपना योगदान देने का अवसर मिला.
उन्होंने कहा कि भारत की ताकत को अब पूरी दुनिया पहचान चुकी है. सर्जिकल स्ट्राइक जैसे अभियानों के बाद पाकिस्तान को यह समझ आ गया है कि यदि उसने भविष्य में किसी भी तरह का दुस्साहस किया तो भारतीय सेना उसका मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है. उन्होंने कहा कि भारतीय सेना की क्षमता और जवानों का हौसला किसी भी चुनौती से बड़ा है.
उरी सेक्टर में शुरू हुई थी असली परीक्षा : हवलदार माणिक वारदा बताते हैं कि करगिल युद्ध के दौरान उनकी टुकड़ी को मोर्चे पर भेजा गया था. रास्ते में कई स्थानों पर रुकते हुए वे उरी सेक्टर पहुंचे, जहां पहाड़ियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी. जैसे ही उनकी टुकड़ी वहां पहुंची, दुश्मन की ओर से भारी गोलीबारी शुरू हो गई. उस समय उन्हें महसूस हुआ कि सैनिक जीवन में युद्ध का अवसर हर किसी को नहीं मिलता. उन्होंने कहा कि भाग्यशाली सैनिकों को ही अपनी सेवा अवधि में देश की रक्षा के लिए युद्धभूमि में उतरने का मौका मिलता है. हर जवान का सपना होता है कि वह मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वोच्च योगदान दे.
18 घंटे बर्फ में दबे रहे, फिर भी नहीं टूटा हौसला : करगिल की दुर्गम पहाड़ियों पर युद्ध के दौरान लगातार गोलाबारी हो रही थी. चारों तरफ बर्फ, गोलियों की आवाज और दुश्मन की हरकतों के बीच भारतीय जवान अपने मोर्चे पर डटे हुए थे. इसी दौरान पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा खिसक गया और माणिक वारदा समेत उनके चार साथी मलबे और बर्फ में दब गए.
करीब 18 घंटे तक वे बर्फ के अंदर फंसे रहे. उनकी टुकड़ी के साथियों ने अदम्य साहस दिखाते हुए उन्हें बाहर निकाला. इस हादसे में उनके एक साथी वीरगति को प्राप्त हो गए. गंभीर रूप से घायल माणिक वारदा को बेहतर इलाज के लिए पहले श्रीनगर, फिर उधमपुर और बाद में पुणे स्थित आर्टिफिशियल लिम्ब सेंटर भेजा गया, जहां उनके कृत्रिम अंग लगाए गए.
मिशन अधूरा रहने का आज भी है दर्द : माणिक वारदा कहते हैं कि उन्हें आज भी इस बात का अफसोस है कि वह अपना मिशन पूरी तरह पूरा नहीं कर पाए. हालांकि देश के लिए दिया गया उनका बलिदान और संघर्ष हर भारतीय के लिए प्रेरणा है. वह कहते हैं कि शरीर के अंग चले गए, लेकिन देश की सेवा का जज्बा कभी कम नहीं होगा. उन्होंने श्रीलंका में भेजी गई भारतीय शांति सेना (आईपीकेएफ) में भी अपनी सेवाएं दी थीं. लंबे सैन्य जीवन में उन्होंने कई चुनौतियों का सामना किया और हर बार देश को सर्वोपरि रखा.
परिवार भी है उनकी ताकत : गोविंदपुर के गदरा निवासी माणिक वारदा आज भी आत्मविश्वास के साथ जीवन जी रहे हैं. उनकी पत्नी शिक्षिका हैं. उनका बड़ा बेटा दिल्ली में इंजीनियर है, जबकि छोटा बेटा जमशेदपुर में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहा है. परिवार उनके साहस और संघर्ष का मजबूत सहारा है. करगिल युद्ध के इस वीर योद्धा की कहानी बताती है कि सैनिक केवल हथियारों से नहीं, बल्कि अदम्य इच्छाशक्ति और देशप्रेम से लड़ता है. माणिक वारदा आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा हैं कि राष्ट्रसेवा का संकल्प शरीर की सीमाओं से कहीं बड़ा होता है.




