संतोष कुमार / सरायकेला : झारखंड की लोक कला आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है. कला नगरी सरायकेला से निकली लोक नृत्य छऊ देश-विदेश में धूम मचा रही है. छऊ प्रसिद्धि का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस कला को सीखने विदेशों से लोग सरायकेला एवं आसपास के जिलों में बसे छऊ के गुरुओं के पास आ रहे हैं. सरायकेला के छऊ गुरुओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छऊ की पहचान बनाई है. जिसके सार्थक परिणाम सामने आ रहे हैं. छऊ नृत्य अब विदेशियों को खूब लुभा रहे हैं. (नीचे भी पढ़ें)

ऐसे ही अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त छऊ गुरु अधर कुमार हैं. जिन्होंने छऊ नृत्य को सरायकेला-खरसावां जिले के छोटे से गांव जामडीह से बाहर निकालकर अमेरिका, ईटली, ब्रिटेन, थाईलैंड तक पहुंचा दिया. जिसकी बानगी आप इन तस्वीरों में देख सकते हैं. जिसमें आपको दिखेगा कि प्रकृति की अप्रतिम छटा लिए झारखंड-बंगाल की सीमा पर सटे एक छोटे से गांव जामडीह में छऊ गुरु अधर कुमार से छाऊ नृत्य की बारीकियों को सीखने अमेरिका, इटली, ब्रिटेन और थाईलैंड के छात्र-छात्राएं इन दिनों जुटी हैं. हाईटेक जीवनशैली को त्याग कर विदेशी कलाकार छोटे से गांव में आकर छऊ की बारीकियां सीख रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि झारखंडी लोक नृत्य छऊ ने कितनी ऊंची उड़ान भर ली है. (नीचे भी पढ़ें)

इटली से छऊ की बारीकियां सीखने आयीं शेफाली कोविरिच ने बताया कि उन्हें छऊ से प्यार है. यही वजह है कि वे सात समंदर पार से इस कला को सीखने यहां आयीं हैं. उन्होंने बताया कि जनजातीय परिवेश में इस कला को सीखने का अनुभव काफी प्रभावित कर रहा है. वहीं शांतिनिकेतन बोलपुर से पहुंची कलाकार काली दास ने बताया कि वे एक स्टेज आर्टिस्ट हैं. (नीचे भी पढ़ें)
छऊ नृत्य एक ऐसी विधा है जिसमें भाव होते हैं. इस नृत्य के विषय में बचपन से ही काफी कुछ जानती हूं, इसकी बारीकियों को सीखने यहां आयी हूं. इसका अभ्यास करने से शरीर को काफी रिलेक्स मिलता है. राजस्थान से आए कलाकार प्रवीण कुमार ने बताया इस नृत्य के बारे में काफी कुछ सुना है. इस नृत्य की पहचान अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो चुकी है, इसलिए हम इसकी बारीकियों को सीखने यहां आए हैं काफी अच्छा लग रहा है. (नीचे भी पढ़ें)
आपको बता दें कि छऊ की तीन शैलियां हैं इनमें सरायकेला, खरसावां और मानभूम शैली शामिल हैं. छऊ को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाने में कुंवर विजय प्रताप सिंहदेव, सुरेंद्र नारायण सिंहदेव, नटशेखर वन बिहारी पटनायक, केदारनाथ साहू, शशधर आचार्य, मकरध्वज दरोगा, पंडित गोपाल दुबे सरीखे गुरुओं की अहम भूमिका रही है. इनमें से सुरेंद्र नारायण सिंह देव, केदारनाथ साहू, शशधर आचार्य, गोपाल दुबे सहित सात छऊ गुरुओं को पद्मश्री सम्मान से नवाजा जा चुका है. छऊ के महान विभूतियों के विरासत को आगे बढ़ाते हुए छऊ गुरु अधर कुमार इसे अब विदेशों तक पहुंचा रहे हैं. (नीचे भी पढ़ें)
अगर कुमार पश्चिम बंगाल के बोलपुर स्थित शांतिनिकेतन कला केंद्र में छऊ नृत्य का प्रशिक्षण देते हैं. अधर कुमार के दादा एवं पिता भी छऊ नृत्य के उस्ताद रह चुके हैं, और अब उनकी चौथी पीढ़ी इस कला को साधने में जुटे हैं. जो देशी- विदेशी कलाकारों के साथ कदमताल करते देखे जा रहे हैं, जो एक सुखद अनुभूति है. इससे साफ जाहिर होता है कि छऊ नृत्य आज किसी परिचय का मोहताज नहीं, बल्कि जरूरत है इस महान विरासत को सरकारी संरक्षण का, ताकि झारखंड की महान विरासत की धमक इसी तरह बनी रहे.



