नई दिल्ली : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित पुरस्कार वितरण समारोह में झारखंड आंदोलन के प्रमुख स्तंभ एवं पूर्व केंद्रीय दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सममान पद्म भूषण से सम्मानित किया. दिशोम गुरु शिबू सोरेन की धर्मपत्नी एवं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति से यह सम्मान ग्रहण किया. इस अवसर पर गांडेय की विधायक कल्पना सोरेन, अंजली सोरेन व परिवार के अन्य सदस्य भी मौजूद रहे. आज आयोजित दूसरे नागरिक सम्मान समारोह में राष्ट्रपति ने उनके सहित कुल 65 हस्तियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया, जिनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री शिबू सोरेन के अलावा टेनिस स्टार विजय अमृतराज, अभिनेता ममूटी और गायिका अलका याग्निक सहित कई हस्तियां शामिल हैं. राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस समारोह में उप राष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह, अन्य केंद्रीय मंत्रियों समेत कई हस्तियां उपस्थित रहीं. दूसरे नागरिक सम्मान समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जो 65 पद्म पुरस्कार प्रदान किये, उनमें दो पद्म विभूषण, सात पद्म भूषण और 56 पद्म श्री शामिल हैं. राष्ट्रपति ने 25 मई को आयोजित पहले नागरिक सम्मान समारोह में 65 पद्म पुरस्कार प्रदान किए थे, जिनमें दो पद्म विभूषण, छह पद्म भूषण और 57 पद्म श्री शामिल थे. (नीचे भी पढ़ें)
आज पद्म भूषण से सम्मानित हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री सह पूर्व मुख्यमंत्री, दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी, 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था. माता-पिता ने उनका नाम शिवलाल रखा था, किन्तु आगे चल कर वे शिबू सोरेन के नाम से ख्यात हुए. उनकी आरंभिक शिक्षा नेमरा एवं बाद में गोला हाई स्कूल में उनकी आगे की पढ़ाई हुई. उनके पिता सोबरन सोरेन एक शिक्षक एवं गांधीवादी विचारधारा को मानने वाले थे. महाजनी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने के कारण वर्ष 1957 में महाजनों ने उनकी हत्या करा दी. किशोरावस्था में इस तरह पिता को खो देने की घटना ने शिबू सोरेन के जीवन की दिशा ही बदल दी. इसके बाद वे पढ़ाई छोड़ कर अन्याय एवं शोषण के खिलाफ संघर्ष करने में जुट गए. युवावस्था आते-आते उन्होंने आदिवासियों को संगठित कर संताल नवयुवक संघ एवं सोनोत संताल समाज का गठन किया एवं इन संगठनों के जरिये आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई शुरू कर दी. उनके द्वारा शुरू धनकटनी आंदोलन ने आदिवासी हितों की लड़ाई को नई दिशा दी. इसी दौरान उनकी मुलाकात विनोद बिहारी महतो से हुई. बाद में उन्होंने पारसनाथ की पहाड़ियों और टुंडी क्षेत्र को अपने आंदोलन का केंद्र बनाया. वहीं उन्होंने सामूहिक खेती, पशुपालन एवं रात्रि पाठशालाओं की शुरुआत कर ग्रामीण समाज को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया. यही नहीं, स्थानीय आदिवासी समाज के विवादों का स्वयं निपटारा शुरू कर उन्होंने अपनी एक समानांतर सामाजिक व्यवस्था भी स्थापित की, जिसके कारण आदिवासी समाज में उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई और वे दिशोम गुरु के नाम से जाने जाने लगे. (नीचे भी पढ़ें)
वर्ष 1973 में शिबू सोरेन ने विनोद बिहारी महतो एवं एके राय के साथ मिल कर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की स्थापना की. पार्टी में विनोद बिहारी महतो अध्यक्ष एवंशिबू सोरेन महासचिव बने. पार्टी ने यहीं से झारखंड अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया, जो कालांतर में व्यापक जनांदोलन के रूप में उभरा और आपातकाल के दौरान वर्ष 1975 में उन्हें जेल भी जाना पड़ा. वर्ष 1977 में वे टुंडी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े किन्तु उन्हें जीत नहीं मिली. वर्ष 1980 में वे पहली बार दुमका लोकसभा सीट से सांसद चुने गए, जिसके बाद वे कई बार संसद पहुंचे और राष्ट्रीय राजनीति में उच्च स्थान हासिल किया. वर्ष 1987 में निर्मल महतो की हत्या के बाद वे पार्टी के अध्यक्ष बने और वर्ष 2000 में 5 नवंबर को झारखंड अलग राज्य की स्थापना हुई, हालांकि वे राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री नहीं बन पाये. हां बाद में वे तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री के पद पर भी आसीन हुए. उसके बाद राज्य में उनके नेतृत्व में पार्टी का जनाधार बरकरार रहा और वर्ष 2014 के प्रचंड मोदी लहर में भी वे दुमका लोकसभा सीट से चुनाव जीते. वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव में पराजित होने के बाद वे राज्यसभा के सदस्य बने. अप्रैल 2025 में आयोजित पार्टी के महाधिवेशन में हेमंत सोरेन पार्टी के अध्यक्ष बने, जबकि शिबू सोरेन पार्टी के संस्थापक संरक्षक बनाये गए और 4 अगस्त, 2025 को लंबी बीमारी के बाद उनका दिल्ली में ही निधन हुआ.








