कश्मीर से अन्नी अमृता / पहलगाम / कश्मीर : आम तौर पर लोग कश्मीर को आतंकवाद से जानते हैं या फिर पर्यटन के क्षेत्र में एक जन्नत के तौर पर….लोग कश्मीर के गुलमर्ग के बर्फ को जानते हैं, वहां की हरी भरी वादियों की बातें करते हैं लेकिन एक चीज है जिसके बारे में बात कम होती है या कहें कि उसकी वैसी ब्रैडिंग नहीं हो पायी है कि आम आदमी उसके बारे में जान सके. आप हैरान होंगे कि जिस क्रिकेट के बल्ले से आप या फिर स्टार क्रिकेटर क्रिकेट के जलवे दिखाते हैं वे दरअसल कश्मीर में बनते हैं. सचिन तेंदुलकर यहीं से बने बैट का इस्तेमाल करते हैं. आखिर बैट बनता किससे है और ये कश्मीर में ही क्यों बनता है ? ये जानने के लिए थोड़ा पीछे चलना होगा और फिर भूतकाल से वर्तमान में आकर कई बातें पता चलेंगी. (नीचे भी पढ़ें)

विलो पेड़ से बनता है बल्ला, कश्मीर में है कश्मीरी विलो ट्री, इंग्लैंड में है इंग्लिश विलो ट्री-
19 वीं सदी में अंग्रेज इंग्लैड से बहुत सारे इंग्लिश विलो पेड़ लेते आए. हजारों की संख्या में उनलोगों ने विलो पेड़ लगाए. धीरे-धीरे कश्मीर के ग्रामीण क्षेत्र में गांव वाले भी विलो पेड़ लगाने लगे. इस प्रकार कश्मीरी विलो ट्री अस्तित्व में आए. यही वजह है कि भारत में कश्मीर ही ऐसा राज्य है जहां कश्मीरी विलो ट्री पाए जाते हैं. जैसे इंग्लैंड के इंग्लिश विलो ट्री से क्रिकेट के उम्दा बल्ला बनते हैं वैसे ही कश्मीरी विलो ट्री से कश्मीर में क्रिकेट के शानदार बल्ला बनते हैं जो इंग्लैड में बनने वाले बल्ले से कम नहीं होते. भारत में क्रिकेट बल्ला का व्यवसाय कश्मीर पर निर्भर है. कश्मीर से पूरे देश को बल्ला की सप्लाई होती है. कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से पहलगाम जाने के रास्ते सैकड़ों इकाईंया नजर आएंगी जहां क्रिकेट के बने हुए बल्ला रखे दिखाई पड़ेंगे. लगभग 400 इकाईयों में कुल मिलाकर साल भर में 30 लाख बल्ला बनाए जाते हैं. लगभग 300 करोड़ की यह इंडस्ट्री है जिससे एक लाख लोग रोजगार पाते हैं. 102 वर्षों से यह इंडस्ट्री चल रही है और यहां बनने वाले बल्ले को आईसीसी ने मान्यता प्रदान की है. (नीचे भी पढ़ें और देखें वीडियो)
बेताब वैली में टूरिस्टों को नजर आते हैं विलो ट्री – कश्मीर आनेवाले टूरिस्ट जब श्रीनगर से पहलगम आते हैं तो वहां बेताब वैली जरूर जाते हैं. सनी देओल की फिल्म ‘बेताब’ की शूटिंग होने के बाद यह वैली बेताब वैली के नाम से मशहूर हो गई. यहां बड़ी संख्या में कश्मीरी विलो ट्री पाए जाते हैं. हालांकि सर्दियों में बर्फ की खूबसूरती और गर्मियों में हरियाली को देखने के चक्कर में आम तौर पर कश्मीरी विलो ट्री की तरफ किसी की नजर नहीं जाती. लेकिन गाईड की बातों को ध्यान से सुनने वाले जरूर कश्मीरी विलो ट्री के बारे में जान पाते हैं. शार्प भारत संवाददाता अन्नी अमृता को गाईड अहमद ने विलो ट्री के बारे में अहम जानकारियां दी जिसके बाद उस संबंध में तमाम जानकारियां एकत्रित की गईं. साथ ही श्रीनगर से पहलगम और फिर श्रीनगर लौटने के रास्ते बल्ला बनाने वाली इकाईंयों से जुड़े लोगों से भी बातचीत की गई. (नीचे भी पढ़ें)

कैसे तैयार होता है क्रिकेट का बल्ला, क्या खासियत है विलो ट्री की- कश्मीरी विलो ट्री को तैयार होने में 10-12 साल लग जाते हैं. तैयार होने के बाद डेढ़ साल तक उसे सुखाया जाता है और फिर उससे बल्ला तैयार किया जाता है. विलो ट्री काफी मजबूत होते हैं. ये ठंडी जगहो पर ही पाए जाते हैं. इंग्लैंड के बाद भारत का कश्मीर ही ऐसी जगह है जहां विलो ट्री पाया जाता है. इंग्लिश विलो ट्री की पांच प्रजातियां होती हैं जिनमें से ‘सेलिक्स अब्बा केरूलिया’(वैज्ञानिक नाम) नाम की प्रजाति से बल्ला तैयार किया जाता है. एक पेड़ से सौ/दो सौ बल्ला तैयार हो जाते हैं. इंग्लिश विलो जहां सफेद रंग का होता है वहीं कश्मीरी विलो भूरे रंग का होता है. (नीचे भी पढ़ें)

बल्ला इंडस्ट्री की चुनौतियां और पर्यावरण- इंडस्ट्री चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है. इंडस्ट्री से जुड़े लोग बताते हैं कि कश्मीरी विलो ट्री की संख्या लगातार घट रही है. बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण की जरूरत है नहीं तो आनेवाले समय में परेशानी बढ़ेगी. बीच-बीच में बल्ला बनाने वाली इकाईयों को कृषि से जुड़े संस्थानों की तरफ से हजारों विलो पेड़ लगाने के लिए दिए जाते हैं लेकिन फिर भी पेड़ों की कमी होती चली जा रही है. साथ ही पेड़ों के घटने से पर्यावरणीय संतुलन का भी प्रश्न उठता रहता है. बल्ला के लिए पेड़ काटना जरूरी है और संतुलन के लिए ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने की जरूरत है.



