
संतोष वर्मा
चाईबासा : देश में जहां कोरोना से बचाव को लेकर देश के राजनेता से लेकर सभी लोग भयभीत और परेशान इस बात को लेकर है की इसका इलाज नहीं है. लेकिन झारखंड प्रदेश में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा 17 साल पहले कोरोना संक्रमण से बचने के लिए झारखंड में आयुर्देदिक कॉलेज सह आवासिय प्रशिक्षण 100 बेड वाली अयुर्वेद अस्पताल का निर्माण करने के लिए निंव रख दी थी. उस दौरान भवन का निर्माण कार्य तो लगभग पुरी हो चुकी थी, लेकिन यह योजना राजनीति कहें या प्रशासनिक नजर अंदाज का भेंट चढ़ गई यह महत्वकांक्षी योजना. अब 17 साल बाद आयुर्वेद के महत्व को काफी गंभीरता से लिया जा रहा है. यदी यह योजना पूरी हो जाती तो कोल्हान ही नहीं पूरा राज्य के लिए यह आयुर्वेदिक अस्पताल कोरोना जैसी महामारी से निपटने के लिए मिल का पत्थड़ साबित होता. झारखंड में आयुर्वेद के महत्व को 17 साल पहले समझा जा चुका था इसलिए राज्य का पहले आयुर्वेद कॉलेज की स्थापना 2003 में सारंडा के जगन्नाथपुर में शुरू की गई. पूर्व सीएम मधु कोड़ा ने अपने शासनकाल में काफी आगे बढाया और भवन का निर्माण शुरू कराया, लेकिन उसके बाद किसी सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया जिसके कारण सारंडा का आयुर्वेद कॉलेज आज भी अधूरा व विरान पड़ा है. आयुर्वेद कॉलेज के नाम कुछ कर्मी और अधिकारी जरूर हैं, लेकिन वे चाईबासा के सदर अस्पताल में जिला औषधालय में ही बैठते हैं. यहीं से कॉलेज का कार्य होता है, लेकिन जगन्नाथपुर में ना तो कॉलेज चल रहा है और ना ही 100 बेड का अस्पताल. पूर्व सीएम मधू कोडा ने कहा कि यह विडंबना है कि जिस उद्देश्य से आयुर्वेद कॉलेज की स्थापना शुरू की गई, वह आज पूरी नहीं हो सकी. 8-10 साल पहले यह आयुर्वेदिक कॉलेज बन जाता तो कोरोना काल में हम काफी हद तक नियंत्रण करने में कामयाब होते. सांसद गीता कोड़ा ने कहा कि वे इस मामले को पिछले सरकार के समक्ष रखी थी, थोड़ा काम बढा, लेकिन अभी अधूरा पड़ा है, इस सरकार में फिर से मामला उठाने का प्रयास करूंगी. सांसद ने कहा कि अधूरे आयुर्वेद कॉलेज को डीएमएफटी से बनाने की मांग सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय के समक्ष रखेगी.आयुर्वेद कॉलेज का प्राचार्य ने माना कि यदि आज आयुर्वेदिक कॉलेज चल रहा होता तो इसका फायदा पूरे राज्यको मिल सकता था.





