
जमशेदपुर : जहां एक ओर झारखंड के युवा सरकारी नौकरियों की मांग को लेकर लगातार आंदोलन पर उतारू हैं, वहीं ऐसी भी एक युवती है, जिसने जनसेवा के अपने संकल्प को पूरा करने के लिए अपनी लगी-लगायी सरकारी नौकरी और सुरक्षित आर्थिक वातावरण छोड़ दिया है. पूर्वी सिंहभूम जिला परिषद सीट संख्या -6 पर चुनाव लड़ने के लिए कुसुम पूर्ति (29) ने सामाजिक उत्प्रेरक की अपनी सरकारी नौकरी से शनिवार को इस्तीफा दे दिया. इस सीट से पिछले लगातार दो चुनावों से वर्तमान जिला परिषद उपाध्यक्ष राजकुमार सिंह चुनाव जीतते आ रहे हैं. इस बार यह सीट आरक्षित है. परसुडीह के सरजामदा स्थित लुपुंगटोला की निवासी कुसुम पूर्ति ने एल बीएसएम कॉलेज से इंटर तक की पढ़ाई की है. उनका लक्ष्य अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरा करना है, चुनाव खत्म होने के बाद वह अपनी स्नातक डिग्री हासिल करने पर फोकस करेंगी. वैसे राजकुमार सिंह चाहते तो अपने परिवार की महिला को चुनाव लड़ा सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं कर उन्होंने परिवारवाद पर करारा तमाचा जड़ा है.
सामाजिक उत्प्रेरक की नौकरी से दिया इस्तीफा
कुसुम पिछले पांच साल से जमशेदपुर प्रखंड में सामाजिक उत्प्रेरक के रूप में काम रही हैं. जलजीवन मिशन के तहत जल संरक्षण तथा स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत शौचालय निर्माण के लिए लोगों को प्रेरित करने में उनकी बड़ी भूमिका रही है. इसके अलावा सामाजिक कार्यों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने के कारण कुसुम क्षेत्र में काफी लोकप्रिय हैं. उन्होंने स्वयं सहायता समूहों और ग्राम संगठनों के साथ भी नजदीकी से काम किया है. शनिवार को उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया.
महिलाओं के लिए कुछ अलग करने का जज्बा है
समाजसेवा में आने के बारे में कुसुम कहती हैं कि वे नौकरी में रहते हुए भी समाजसेवा करती रही हैं. समाज खासकर महिलाओं के लिए कुछ अलग करने का जज्बा हमेशा से उनके दिल में था. उनका कहना है कि नौकरी की अपनी मजबूरियां होती हैं. यही कारण है कि उन्होंने पंचायत चुनाव के माध्यम से जनसेवा का पूर्णकालिक काम चुना है. जिला परिषद चुनाव ही क्यों? इस सवाल पर कुसुम कहती हैं कि जिला परिषद के उपाध्यक्ष राजकुमार सिंह की प्रेरणा से उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला किया है. कुसुम के अनुसार समाजसेवा के उनके कार्यों और जरूरतमंद लोगों के लिए कुछ करने की उनकी लगन से प्रभावित होकर राजकुमार सिंह ने उन्हें जिला परिषद का चुनाव लड़ने की सलाह दी.
दादी और बुआ को देख जगी समाजसेवा की ललक
समाजसेवा के माध्यम से अपना नाम, पहचान और अपना मुकाम हासिल करने की इच्छा रखनेवाली कुसुम के मन में अपनी दादी और बुआ को देख कर समाजसेवा की ललक पैदा हुई. कुसुम अपनी दादी करुणा पूर्ति के रास्ते पर चल रही हैं, जिन्होंने लोगों की सेवा के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी थी. कुसुम बताती हैं कि उनकी दादी पहले असम में नर्स के रूप में तैनात थीं. बाद में उन्होंने टाटा मोटर्स अस्पताल में नर्स के रूप में सेवा दी, लेकिन लोगों की सेवा के प्रति वे इतनी समर्पित थीं, कि उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और आजीवन दीन-दुखियों की सेवा करती रहीं. इलाके में उनका बड़ा नाम है.
अपनी अलग पहचान बनाना चाहती है कुसुम
कुसुम अविवाहित हैं. शादी के बारे में पूछे जाने पर कहती हैं कि एक लड़की के लिए अपनी पहचान होना जरूरी है. हमारे समाज में लड़की जन्म के समय पिता, शादी के बाद पति और बुढ़ापे में बेटे के नाम से जानी जाती हैं. लेकिन मुझे अपने नाम से जाना जाता है. इसका मुझे गर्व है कि मेरे पिताजी को लोग आज मेरे नाम से जानते हैं.




