
जमशेदपुर : झारखंड के आर्थिक राजधानी लौहनगरी की स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है. कोल्हान के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल ने अपना मानवता को खो दिया है. एक पिता अपनी मासूम बच्ची को कंधे पर लेकर इलाज के लिए 15 किलोमीटर से जमशेदपुर पहुंचा. इस पिता ने पहले 108 नंबर डायल कर एंबुलेंस वालों से सहायता मांगी, लेकिन एंबुलेंस वालों ने सहायता देने से इनकार कर दिया. फिर मरता क्या नहीं करता अपने मासूम बच्ची को तड़पता देख पिता बच्ची को अपने कंधे लेकर मोटरसाइकिल से 15 किलोमीटर दूर गम्हरिया के ग्रामीण इलाकों से जमशेदपुर पहुंचा. जैसे- तैसे पिता अपनी बच्ची को लेकर जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल तो पहुंच गया, लेकिन एमजीएम अस्पताल ने भी कोई सहयोग नहीं किया, ना तो स्ट्रेचर दिया और ना ही किसी नर्स या कर्मचारी ने इस वेबस पिता का साथ दिया. इस मासूम बच्ची के पिता और मां इलाज के लिए अस्पताल में तपती धूप में तड़पते रहे. कभी नया बिल्डिंग तो कभी पुरानी बिल्डिंग, कभी इमरजेंसी वार्ड तो कभी एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग. वैसे थक हार कर यह पिता चेयर पर बैठ गया और अपनी पुत्री को मां के हवाले कर दिया. पिता इतना वेबस कि इसे पता ही नहीं कि हम अपनी बेटी का इलाज कहां करायें और ना ही कोई बताने वाला है. बच्ची जिंदगी और मौत से जूझ रही है और लाचार पिता इलाज के लिए एमजीएम अस्पताल में दर-दर भटक रहा है. वैसे एमजीएम अस्पताल की मानवता तो मर गई लेकिन सबसे बड़ी बात है कि राज्य के स्वास्थ्य मंत्री का यह गृह जिला है. इतना ही नहीं स्वास्थ्य मंत्री के एमजीएम प्रभारी इस अस्पताल में कार्यालय खोलकर बैठे हैं. इसलिए कि गरीबों को इलाज के लिए नहीं मोटी रकम कमाने के लिए अस्पताल का जो फंड आता है वह फंड उनके गुर्गों को मिले. अब सवाल ये उठता है कि जब स्वास्थ्य विभाग के मंत्री की ही मानवता मर गई है, तो अस्पताल के डॉक्टर और कर्मचारी का क्या हाल होगा यह समझने में आपको थोड़ा भी देर नहीं लगा होगा.






