
रांची : झारखंड की राजधानी रांची के कश्यप मेमोरियल आई अस्पताल के सभागार में नेत्रदान जागरूकता क्लब (आई डोनेशन अवेयरनेस क्लब) द्वारा 36वें राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा के अंतर्गत आई डोनेशन अवेयरनेस कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस एवं विशिष्ट अतिथि झारखण्ड के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता थे. आई डोनेशन अवेयरनेस क्लब के अध्यक्ष अनुज सिन्हा ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया. डॉ भारती कश्यप ने आई डोनेशन अवेयरनेस क्लब के सदस्यों का परिचय मुख्य अतिथि राज्यपाल से कराया. कार्यक्रम के दौरान मृत्यु उपरांत अपने परिजनों के नेत्रदान करने वाले परिवारों बेबी अपराजिता, नर्मदा देवी गाड़ोदिया, शैलेश कोठारी, साधना जैन और कमला रानी भाटिया को राज्यपाल रमेश बैस एवं स्वर्गीय प्रभात कुमार तुलस्यान, शारदा देवी लोहिया, द्रौपदी देवी चौधरी, इंद्रा देवी जैन और रश्मि मारू को स्वास्थ्य मंत्री द्वारा सम्मानित किया गया.

सन 1995 में संयुक्त बिहार-झारखण्ड का पहला नेत्र प्रत्यारोपण डॉ बीपी कश्यप और डॉ भारती कश्यप द्वारा स्वर्गीय हरिप्रसाद के मृत्योपरांत किए गए स्थानीय नेत्रदान से किया गया था. यह आई बैंक राज्य का प्रथम एक्टिव आई बैंक है, जो पिछले 26 वर्षों से सफलतापूर्वक कॉर्निया जनित दृष्टिहीनों को रोशनी दे रहा है. कश्यप मेमोरियल आई बैंक द्वारा अभी तक 606 कॉर्निया के बीमारी से ग्रसित मरीजों को नेत्र प्रत्यारोपण से लाभान्वित किया है. पूरे देश में अप्रैल 2019 से लेकर मार्च 2020 तक 50,953 नेत्रदान हुए जबकि कॉर्निया प्रत्यरोपण केवल 27,075 हुए. 50 प्रतिशत दान में मिले कॉर्निया बर्बाद हो गए. सबसे बड़ी समस्या है कि जो नेत्रदान में मिले हैं, उनकी सुरक्षा की जाए और उनको प्रत्यारोपण के लिए काम में लाया जाए. इसकी वजह यह है कि सभी आई बैंक संसधान युक्त नहीं होते, उनके पास कॉर्निया को सुरक्षित रखने के लिए अच्छे स्टोरेज मीडियम नहीं होते, उनके पास अच्छे कॉर्निया सर्जन का अभाव होता है, देश के सभी आई बैंक कॉर्निया डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम से नहीं जुड़े हैं. ऐसी स्थिति में जिन आई बैंक के पास ज्यादा कॉर्निया होती है मगर प्रत्यारोपण कम होता है वहां से दूसरे ऐसे आई बैंक तक कॉर्निया नहीं पहुंच पाती जहां पर कॉर्निया जनित दृष्टिहीन मरीजों की लंबी प्रतीक्षा सूची है मगर कॉर्निया का दान कम है. कॉर्निया डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के नेटवर्क से देश के सभी एक्टिव 109 आई बैंकों को जोड़कर काफी हद तक कॉर्निया को बर्बाद होने से बचाया जा सकता है.

कश्यप मेमोरियल आई बैंक की मेडिकल डायरेक्टर डॉ भारती कश्यप ने बताया कि हमें ख़ुशी है कि हमारे पास कॉर्निया जनित दृष्टिहीनता से प्रभावित मरीजों की लंबी सूची है, विशेष प्रकार के नेत्र प्रत्यारोपण में प्रशिक्षित एफआरसीएस एवं आइसीओ की अंतर्राष्ट्रीय डिग्री से सम्मानित डॉ निधि गडकर कश्यप की भी टीम है, जिनके द्वारा पिछले दो वर्षों से ज्यादातर नेत्र प्रत्यारोपण अत्याधुनिक पद्धति डीसेक, जो एक प्रकार की लैमेलर केराटोप्लास्टी है, द्वारा किया जा रहा है. इसका फायदा ज्यादा से ज्यादा गरीब मरीजों को आयुष्मान भारत के द्वारा मिल रहा है. स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि नेत्रदान एक धार्मिक काम है क्योंकि ऐसे काम आत्मा से किए जाते हैं. जब आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है, तभी नेत्रदान जैसे काम होते हैं. इसे बढ़ावा देने और इसके सफल संचालन के लिए मैं डॉ बीपी कश्यप, डॉ भारती कश्यप, उनके पुत्र डॉ विभूति और उनकी पुत्रवधू का धन्यवाद करना चाहता हूं, क्योंकि कोरोना काल में भी आपने 120 लोगों के नेत्र प्रत्यारोपण किए. झारखंड में क़रीब डेढ़ करोड़ लोग ऐसे हैं, जो देख नहीं सकते. इनमें से 75 प्रतिशत लोगों को ठीक किया जा सकता है. देश में 109 आई बैंक हैं लेकिन आपसी समन्वय नहीं होने के कारण कहीं कहीं कार्निया रहने के बाद हम उसका उपयोग नहीं कर पाते हैं. वे सबसे कम उम्र की आई डोनर अपराजिता की मां का भी धन्यवाद करना चाहता हूँ कि उन्होंने इतना साहसिक निर्णय लिया. मुझे गर्व है कि ऐसे नेक काम में प्रेस की भी भागीदारी है. हम आई बैंकों के कोआर्डिनेशन की कमियों को दूर करेंगे और राजनीतिक अनुभव के धनी राज्यपाल जी के दिशानिर्देश पर काम कर हमारी सरकार राज्य की तरक़्क़ी का रास्ता तैयार करेगी. राज्यपाल ने कहा कि हर छोटा काम बड़ा होता है. अगर कोई लंबे समय से अंधेरे में हो और उसे अचानक सबकुछ दिखने लगे, तो उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता. दक्षिण अफ़्रीका भ्रमण के दौरान मैं एक सोने की खदान में काम करने वाले एक मज़दूर से मिला, जो छह महीने से खदान में ही काम कर रहा था. छह महीने बाद जब वह खदान से बाहर आया और उसने सूरज की रोशनी देखी, तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. अब कल्पना कीजिए कि जिसको पहले कुछ नहीं दिखता हो, उसे आँख मिल जाए तो उसे कितनी ख़ुशी होगी. डॉ भारती ने मुझे बताया कि नेत्रदान के प्रति जागरूकता उतनी नहीं है. लोग भावनाओं में बह जाते हैं लेकिन अगर भावना से ऊपर उठकर सोचें, तो कितना बड़ा काम हो सकता है. किसी को आँखें मिल जाएँ इससे बड़ी बात कुछ और नहीं हो सकती. आज संपूर्ण विश्व नोबेल कोरोना वायरस की समस्या से ग्रसित है. हमारा देश और प्रदेश भी इन चुनौतियों का सामना कर रहा है. हमने कई अपने लोगों को खो दिया है. इन विषम परिस्थितियों में भी कश्यप मेमोरियल आई हॉस्पिटल ने जो कार्य किए हैं, वह एक उदाहरण है.






