
पोटका : आदिवासी आदि काल से ही आदिवासी समाज अपने सामाजिक रीति रिवाज, पूजा पद्धति, धर्म, भाषा संस्कृति, जल, जंगल, जमीन तथा परंपरा का निर्वाह करते हुए अस्तित्व पहचान को स्थापित किया है. सदियों से पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के तहत संचालित होते हैं तथा वर्तमान में भारत के संविधान में आदिवासियों को प्रदत संवैधानिक अधिकार जिसमें आदिवासियों के नियंत्रण, प्रशासन एवं उन्नति और कल्याण को अधिकार प्राप्त है जो वर्तमान में इन सभी व्यवस्था तथा संविधान प्रदत्त अधिकारों का हनन हो रहा है जिससे आदिवासियों का अस्तित्व पहचान खतरे में है. ऐसी स्थिति में अगर आदिवासियों के सामाजिक रीति-रिवाज, पूजा पद्धति, धर्म, भाषा संस्कृति, जल, जंगल, जमीन, परंपरा तथा संविधान प्रदत्त अधिकारों का संरक्षण नहीं किया गया जाता है तो आदिवासियों का नामोनिशान समाप्त हो जाएगा. (नीचे भी पढ़ें)

आदिवासी समाज को पूर्ण विश्वास है कि झारखंड विधानसभा के आसन्न बजट सत्र में विभिन्न लिखित मांगों को सदन में पोटका विधानसभा क्षेत्र के विधायक संजीव सरदार रखेंगे और आदिवासियों के अस्तित्व पहचान को कायम रखते हुए समाज का सर्वांगीण विकास किया जाए. उनकी मांग है कि झारखंड का स्थानीय नीति राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में हुए अंतिम सर्वे सेटेलमेंट (खतियान) के आधार पर बने तथा नियोजन नीति पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में प्रखंड स्तर पर बनाया जाए, संथाली भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है इसलिए संथाली भाषा को झारखंड में प्रथम राज्य भाषा का दर्जा दिया जाए, जेएसएससी में नियुक्त परीक्षा में क्षेत्रीय भाषा के रूप में शामिल भोजपुरी, मगही, अंगिका और मैथिली भाषा को अभिलंब हटाया जाए, आगामी आम जनगणना में सरना धर्म कोल्लम कोड को अंकित करने के लिए सरकार उचित पहल करें, “लैंड पूल” कानून से सीएनटी या एसपीटी कानून का घोर उल्लंघन हो रहा है तथा “लैंड बैंक” कानून से ग्राम सभा के सार्वजनिक स्थानों जमीनों को ग्राम सभा से छीना जा रहा है इसलिए दोनों कानून को अविलंब निरस्त किया जाए, झारखंड राज्य विकास में जनजातीय समुदाय का अहम भूमिका सुनिश्चित हो इसके लिए टीएसी के 20 सदस्यि सूची में 75 फीसदी (15) सदस्य आदिवासी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के आगुवा ( पारगाना, माझी, मनकी, मुंडा, पड़हा राजा) आदि को शामिल किया जाए, पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों में पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था संचालित है इसलिए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव नहीं कराया जाए तथा ग्राम सभा को सशक्त करते हुए छठी अनुसूची के तर्ज पर क्षेत्र के विकास के लिए नियमावली बनाई जाए, पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में नगर निगम, नगर पालिका का गठन संविधान की अनुच्छेद 243 जेएडसी के तहत असंवैधानिक है अतः अनुसूचित क्षेत्र में गठित नगर निगम नगर पालिका नगर पंचायत को अविलंब निरस्त की जाए, भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून 2018 को अविलंब रद्द किया जाए, झारखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र में भीड़ द्वारा हत्या के मामले में जो मोब लिंचिंग कानून (बिल) पारित हुआ है इसका हम स्वागत करते हैं मगर उसी कानून में अध्याय 1 का कड़ी 2 के परिभाषा के क्रम संख्या IV सबक्लोज ‘क’ से ‘च’ तक जो परिभाषाएं दिए गए हैं उसमें सामाजिक बहिष्कार जैसे पारंपरिक न्याय प्रक्रिया को भी अपराधिक कृत्य में परिभाषित किया गया है, जिससे आदिवासी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था का न्यायपालिका (विचार व्यवस्था) को आघात पहुंचाता है या समाज व्यवस्था के नियंत्रण प्रशासन को प्रभावित करता है इसलिए उसे संशोधित किया जाए तथा सामाजिक पारंपरिक न्याय सामाजिक बहिष्कार को अपराधिक कृत्य सूची से हटाया जाए, संथाली भाषा का ओलचिकी लिपि से प्रथमिक विद्यालय से विश्वविद्यालय तक पढ़ाई आरंभ किया जाए तथा संथाली शिक्षकों की आवश्यकता अनुसार बहाल किया जाए, झारखंड राज्य के स्थानीय व्यक्ति जो झारखंड राज्य के बाहर दूसरे राज्यों से मैट्रिक, इंटर या उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं उन्हें भी जेटीईटी परीक्षा में शामिल किया जाए. (नीचे भी पढ़ें)
गौ हत्या निषेध अधिनियम 2005 से जनजाति समुदाय की पूजा पद्धति, एवं धार्मिक आस्था पर ठेस पहुंचाता है तथा स्वरुचि भोजन को प्रभावित करता है इस कानून को अविलंब निरस्त किया जाए, भारतीय संविधान में प्रदत्त पांचवी अनुसूची के अधिकारों को सख्ती से राज्य के पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों में लागू किया जाए ताकि “ग्राम सभा” के अधिकारों का हनन /उल्लंघन करना बंद किया जाए, पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों में जनजाति भाषा संस्कृति रीति रिवाज तथा पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को जानने वाले प्रशासनिक पदाधिकारियों को बहाल किया जाए, संथाली भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज है इसलिए संताली भाषा के विकास के लिए संथाली साहित्य अकादमी और बोर्ड का गठन अलग से झारखंड राज्य में किया जाए, जनजाति समुदाय के जाहेरथान, देशाउली, सारना, मासना, माण घाटी, गोट टांडी आदि सार्वजनिक स्थल जिसका प्लॉट खतियान में दर्ज नहीं है घेराबंदी कर संरक्षित करने में समस्या होती है इसलिए इन सभी सार्वजनिक स्थलों का पट्टा दिया जाए, नारेगा योजना का सामाजिक अंकेक्षण वर्तमान में एनजीओ के द्वारा किया जाता है जो गलत है इसका अंकेक्षण ग्राम सभा के द्वारा कराया जाए. इन्ही मांगों को लेकर माझी परगना महाल के द्वारा विधानसभा में बुलंद आवाज के साथ आदिवासियों के बात को रखने के लिए पोटका विधानसभा क्षेत्र के विधायक संजीव सरदार को मांग पत्र सौंपा गया है.




