जमशेदपुर : झारखंड के जमशेदपुर शहर स्थित टाटा मुख्य अस्पताल (टीएमएच) में इलाजरत बिहार के प्रख्यात वामपंथ के चेहरा और बिहार के पूर्व मंत्री सह पूर्व विधायक प्रोफेशर नलिनी रंजन सिंह का शनिवार की अहले सुबह निधन हो गया. वे 82 साल के थे. वे अपने पीछे एक बेटी और दामाद का परिवार छोड़ गये है. उनकी उनकी बेटी सुमिता नुपूर जमशेदपुर के टीएमएच के पास स्थित बंगला में रहती है. उनके दामाद टाटा स्टील के वाइस प्रेसिडेंट आयरन मेकिंग उत्तम सिंह है. उनका अंतिम संस्कार जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित पार्वति घाट में किया गया. इस मौके पर समाज के गणमान्य लोग मौजूद थे. उनके अंतिम संस्कार के साथ ही बिहार की राजनीति का एक बड़ा नाम खो गया. (नीचे देखे पूरी खबर, कौन है प्रोफेशर नलिनी रंजन सिंह)

कौन है प्रोफेशर नलिनी रंजन सिंह, जानें
प्रो नलिनी रंजन सिंह….पहचान विराट थी, नाम ही काफी था. उनकी भतीजी लेकिन बेटी के सामान विनिता मिश्रा के अनुसार, बिहार सरकार में कैबिनेट मंत्री (भवन एवं आवास मंत्री, बिहार सरकार, 1991-1995), में रह चुके थे. बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर जिले के कांटी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से 1980 से 1995 तक लगातार तीन बार विधायक के रूप में चुने गये. राजनीति में उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी. प्रोफेसर नलिनी रंजन सिंह मुजफ्फरपुर के प्रख्यात राम दयालु सिंह कॉलेज के मनोविज्ञान के प्राध्यापक के रूप में ख्याति अर्जित की थी. स्वर्गीय नलिनी बाबू धारा के विपरीत संघर्ष की राजनीति के प्रतीक थे. 1980 में पूरे बिहार में वामपंथी दल एसयूसीआइ के एकमात्र विधायक कांटी से वे चुने गए थे, जो उनकी ज़मीनी संघर्ष का ज्वलन्त उदाहरण था. 1980 में उन्होंने राजनीति की मुख्य धारा से लड़कर सफलता अर्जित की थी. बिहार सरकार के तत्कालीन मंत्री स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद, जो जनता पार्टी से थे और प्रोफेशर शम्भू शरण ठाकुर कांग्रेस से उम्मीदवार थे, को हराकर विजयी बने थे. वर्ष 1985 का चुनाव कितना विकट था. भारतीय राजनीति की बड़ी हस्ती पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय तारकेश्वरी सिन्हा उनके विरुद्ध लड़ने कांटी बुलाई गई थी. संघर्ष बड़ा कठिन था पर कभी न हार मानने वाले नलिनी बाबू ने फिर एक बार एसयूसीआइ से विजयी घोषित हो ही गये और निकट की लड़ाई में तारकेश्वरी जी को हरा दिया और अपनी जमीनी पकड़ का परिचय दे दिया. राजनीति के इस धुरन्धर ने 1990 का चुनाव जनता दल से लड़ा और कांग्रेस के प्रो शम्भू शरण ठाकुर को फिर अच्छे खासे मतो से हराकर विजय श्री की माला पहनी. बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए लालू प्रसाद यादव के मंत्रिमंडल विस्तार में उनको कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया. संयुक्त बिहार के कैबिनेट मंत्री के रूप में इन्होंने अपनी कर्मठता, मेहनत, लगन, सूझबूझ से छाप छोड़ी. राजनीतिक लड़ाई तो ये शुरू से ही लड़ते रहे, शायद लड़ाकू प्रवृति बालपन से ही था. 1995 का चुनाव में ये कांटी से समता पार्टी से लड़े पर उनको हार का मुंह देखना पड़ा. इस बीच उनकी पत्नी और बेटे की पेरिस में हुए सड़क हादसे में मौत हो गयी, जिसके बाद वे थोड़े डगमगा गये थे. पारिवारिक भीषण हादसा और उम्र को उन्होंने कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. जीवटता व कर्मठता के प्रतीक थे नलिनी बाबू. एक बड़े जमींदार परिवार में जन्म, बनारस व लन्दन में उच्च शिक्षा, प्रोफेसर का सम्मानजनक सेवा पर विचारो से वामपन्थी व व्यवस्था विरोधी के रुप में उनको जाना जाता रहेगा. राजा रुक्मणि रमन सिंह, रीगा स्टेट कट्टर कांग्रेसी के सबसे बड़े पुत्र वाम विचारो से ओत-प्रोत और संघर्ष के प्रतीक बन 1965 के बाद मुज़फ्फरपुर शहर में उभर रहे थे जो कि जनमानस में चर्चा का विषय बन चुका था. राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना 1967 में इनके अत्यंत निकट के रिश्तेदार, अभिभावक राजनीति के एक बड़े हस्ती स्वर्गीय महेश प्रसाद सिंह कांटी चुनाव लड़ने आ गए. उनके विरोध का कमान विरोधियों ने इन्हें ही थमा दिया. नलिनी बाबू पीछे नही हटे. अपनी विचारधारा से डटे रहे और जमकर विरोध में प्रचार किया. बुलन्द आवाज, शानदार व्यक्तित्व, भाषण देने की अद्धभुत शैली, वाक कला के धनी, भासा पर पकड़, तीक्ष्ण बुद्धि, व्याहारिकता में निपुण ऊपर से लड़ाकू, बस संघर्ष सड़क पर सत्ता व व्यवस्था के विरुद्ध, मानवता की सेवा, पीड़ितों का साथ, जुल्म का ख़िलाफ़त अनवरत सिलसिला. लड़े खूब लड़े चुनावी राजनीति में कहीं से पीछे नहीं रहे चाहे पार्टी छोटी ही क्यूं न हो. 1972 में कांटी से विधानसभा लड़कर अपनी ताकत दिखलाई, 1977 में फिर कांटी से चुनाव लड़े, जनता पार्टी की लहर के विपरीत भी लड़कर काफी कम मतो से पराजित हुए. 1977 में तो मुज़फ़्फ़रपुर संसदीय क्षेत्र से भी पार्टी के कहने पर स्वर्गीय जार्ज फर्नाडीस के खिलाफ चुनाव लड़ अपनी संघर्ष को दिखलाया था. 1995 के बाद राजनीति के नए स्वरूप में ये ढल नहीं पाए और अपना पुराना शौक किताबो की दुनिया मे खो गए. लिखने-पढ़ने का शौक अंत काल तक रहा. राजनीति से हटने पर भी समाज से कट नहीं गए थे. पढ़ाकू थे, शिक्षा से जुड़े हुए थे तो राजनीति से विलग होने के बाद शिक्षा का ही अलख जगाया. मुज़फ्फरपुर में चेतन साधन इंस्टीच्यूट उत्तर बिहार का एक प्रमुख शैक्षणिक संस्था बनकर उभरा, आईटीआई और पॉलिटेक्निक कॉलेज भी खोलने के ये प्रयासरत थे. विदेश में पारिवारिक हादसा में उनके इकलौते पुत्र चेतन साधन इंजीनियर और सौभाग्यवती धर्मपत्नी का दुःखद निधन हो गया था और ये खुद बुरी तरह घायल हो गए थे, चोट से पीड़ित रहे पर अंत तक टूटे नही लड़ते रहे अपने जीवन पथ से सकारात्मक ऊर्जा के साथ. ओजस्वनि वाणी के धनी नलिनी बाबू की पुत्री सुमिता नूपुर भी शिक्षा जगत से जुड़ी हुई, उनके दामाद टाटा स्टील में बड़े अधिकारी के रूप में कार्यरत, नातिन व नाती दोनों शिक्षा ग्रहण करने में तल्लीन. आज एक राजनीति का, समाज का बड़ा सितारा बुझ गया, एक गूंजता आवाज खामोश हो गया सदा के लिए पर अपना अमिट छाप छोड़ गया समाज पर. आज की युवा पीढ़ी इनके जीवन वृतांत से कुछ सीख सकती है, एक प्रेरणा ले सकती है.



