
जमशेदपुर : कलकत्ता हाईकोर्ट में टाटा स्टील लिमिटेड द्वारा इन्कैब इंडस्ट्रीज लिमिटेड की सुरक्षित देनदारियों (त्रृणों) को आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक और एसेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा गैरकानूनी तरीके से प्राईवेट कंपनियों (कमला मिल्स, फस्का इन्वेस्टमेंट, पेगाशस एसेट रिकन्सट्रक्शन) को सौंप देने के खिलाफ कलकत्ता उच्च न्यायालय में 2018 में दायर रिट पिटीशन नंबर 14251, 14253 और 15541 में गुरुवार को जमशेदपुर के कर्मचारियों की तरफ से बहस भी समयाभाव के कारण पूरी नहीं हो सकी. अगली सुनवाई 18.03.2021 को होगी जिसमें मजदूरों की तरफ से अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव को अदालत द्वारा अपनी बहस को निष्कर्ष तक ले जाने की अपेक्षा की गयी है. जमशेदपुर कर्मचारियों के अधिवक्ता ने गुरुवार की बहस में कहा कि 1993 से पहले और उसके बाद 2002 तक बैंक अपनी गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का प्रतिभूतिकरण नहीं कर सकती थी. वे अपने ऋृणों की वसूली के लिए दीवानी अदालत या कंपनी के परिसमापन के लिए कंपनी कोर्ट जा सकती थी. 1993 में ऋृण वसूली न्यायाधीकरण अधिनियम के तहत ऋृण वसूली न्यायाधीकरण की स्थापना हुई और इस ऋृण वसूली न्यायाधिकरण को गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) पर निर्णय देने का पूर्ण अधिकार मिला. उन्होंने आगे बताया कि 2002 में पहली बार नये कानून वित्तीय परिसंपत्तियों का सुरक्षितिकरण और पुनर्निर्माण अधिनियम, 2002 के तहत बैंकों को अपनी गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों के प्रतिभूतिकरण करने की व्यवस्था नये अधिनियम में की गयी. इस अधिनियम के तहत परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी (एआरसी) के रिजर्व बैंक से पंजीकरण की व्यवस्था की गयी. ये कंपनियां बैंकों के गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) को खरीद सकती हैं और बैंकों से ऋृण लेने वाली कंपनियों से कानूनी प्रक्रिया द्वारा वसूली कर सकती हैं. अधिवक्ता ने आगे बताया कि 2002 से 2005 तक केवल परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियां ही बैंकों की गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) खरीद सकती थी. उन्होंने आगे कहा कि 13 जुलाई 2005 से रिजर्व बैंक ने बैंकों को भी दूसरे बैंकों से उनकी गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) को खरीदने और उसे कानूनी प्रक्रिया द्वारा वसूलने का अधिकार दिया पर 2019 तक परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों को बैंकों की गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) को दूसरी परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों को बेचने को मंजूरी नहीं दी. यह मंजूरी केवल 28.06.2019 से दी गयी. उन्होंने आगे कहा कि बैंकों की गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के प्रतिभूतिकरण और निष्पादन का कानून यहीं तक है. इसमें प्राईवेट कंपनियों को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है. ज्ञातव्य है कि कमला मिल्स और उसकी सहायक कंपनियों और पेगासस एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी ने इंकैब कंपनी के बैंकों की गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) को गैरकानूनी ढंग से 2006 में अपने नाम कर लिया और उन्होंने एनसीएलटी में 21.63 करोड़ की जगह 2339 करोड़ रुपये का दावा ठोक दिया. इतना ही नहीं इन प्राईवेट कंपनियों ने बैंकों की इन्हीं गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के असाईन्मेन्ट का दावा कर गैरकानूनी तरीके से एनसीएलटी में लेनदारों की कमिटी में शामिल होकर फर्जीवाड़ा कर एनसीएलटी में एक आवेदन देकर इंकैब कंपनी के परिसमापन का आदेश पारित करा लिया. ज्ञातव्य है कि पिछली बहस में अधिवक्ता ने कलकत्ता उच्च न्यायालय को बताया था कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने 06.01.2016 के आदेश में टाटा स्टील को इंकैब कंपनी का अधिकार संभालने को कहा था और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने सभी देनदार बैंकों के कंसोर्शियम के कस्टोडियन की हैसियत से इंकैब कंपनी से पूर्ण और अंतिम भुगतान के रूप 21.63 करोड़ रूपया लेना स्वीकार किया था. उन्होंने बताया कि उक्त आदेश में बैंकों की सुरक्षित देनदारियों को प्राईवेट कंपनियों को सौंपने की कोई बात नहीं है. दिल्ली उच्च न्यायालय के इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय ने 01.07.2016 अपने के फैसले में सही भी ठहरा दिया तो कमला मिल्स, फस्का इंवेस्टमेंट और पेगासश एसेट रिकंस्ट्रक्शन जैसी प्राईवेट कंपनियाँ, बैंकों द्वारा अपनी सुरक्षित देनदारियों को इन्हें सौंप देने का दावा कैसे कर सकती हैं? उन्होंने आगे बताया था कि दिल्ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के उक्त दोनों आदेशों के आधार पर इन प्राईवेट कंपनियों का कोई दावा इंकैब कंपनी पर नहीं बनता है. उन्होंने अदालत को सूचित किया था कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने 06.01.2016 के अपने उक्त आदेश द्वारा इंकैब की देनदार बैंकों की कुल सुरक्षित देनदारियों को जहां 21.63 करोड़ रूपये पक्का कर दिया था वही आज कमला मिल्स, पेगासश और फस्का जैसे फर्जी दावेदारों द्वारा एनसीएलटी में उसे अविश्वसनीय तरीके से बढ़ाकर 2339 करोड़ रूपये का दावा किया गया है. इससे यह पता लगता है कि इंकैब कंपनी, इसके मजदूरों, कर्मचारियों और तमाम हितधारकों के खिलाफ कितनी बड़ी धोखाधड़ी इन प्राईवेट कंपनियों द्वारा की गयी है. अधिवक्ता ने अदालत को यह भी बताया था कि दस्तावेजों को देखने पर पता चलता है कि आईसीआईसीआई बैंक ने एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को इंकैब की अपनी सुरक्षित देनदारियां सौंप दी, जो कानूनन सही था पर एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी ने इन सुरक्षित देनदारियों को रमेश घमंडीराम गोवानी की कंपनी आरआर केबल्स को सौंप दिया जिसने फिर उसी रमेश घमंडीराम गोवानी की दूसरी कंपनियों-कमला मिल्स और फस्का इनवेस्टमेंट नामक की कंपनियों को बेच दिया. फिर एक्सिस बैंक ने इंकैब की अपनी सुरक्षित देनदारियों को पेगासश एसेट रिकंस्ट्रक्शन नाम की कंपनी को बेच दिया जबकि एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी 28.06.2019 तक इन सुरक्षित देनदारियों को तो दूसरी किसी एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को भी नहीं बेच सकती थी. ज्ञातव्य यह भी है कि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एनसीएलटी द्वारा 07.02.2020 को दिये गये इंकैब कंपनी के परिसमापन के आदेश को अपने संज्ञान में लेकर 05.03.2020 के अपने आदेश में इंकैब के मजदूरों के वकील अखिलेश श्रीवास्तव के इस बहस को दर्ज किया था कि इंकैब कंपनी की सरकारी बैंकों की देनदारियों को प्राईवेट कंपनियों को सौंपना उच्चतम न्यायालय के आईसीआईसीआई बैंक बनाम ऑफिशियल लिक्विडेटर ऑफ एपीएस स्टेट इंडस्ट्रीज लिमिटेड (2010) 10 एससीसी 1 मामले में दिये गये फैसले के प्रतिकूल है. उच्च न्यायालय ने यह भी दर्ज किया था कि सरकारी बैंक अपनी गैरनिष्पादित संपत्तियों (एनपीएज) को सिर्फ सरकारी बैंकों, एसेट रिकंस्ट्रक्शन और एनबीएफसी कंपनियों को ही सौंप सकती हैं. उच्च न्यायालय ने अपने उक्त आदेश में यह भी दर्ज किया भारत के कानून में उस उपरोक्त व्यवस्था के अलावे कुछ और सक्षम करने का प्रावधान नहीं है. इंकैब कर्मचारियों की तरफ से आज की सुनवाई में कलकत्ता उच्च न्यायालय में अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव और आकाश शर्मा ने हिस्सा लिया.




