– रामरीझन रसूलपुरी (संपादक, ‘उत्तर बिहार’)
धाता द्वारा सृजित जगही मेदिनी बीच पाके।
पाके खोया रतन कितने प्राणियों ने अनेकों।।
वैसा प्यारा रतन हमने हाथ से आज खोया।
पाके ऐसा रतन अब लौ है न खोया किसी ने।।
(प्रिय प्रवास)
भाई गंगा प्रसाद ‘कौशल’ का लम्बा कद, गौर वर्ण और सौम्य मुखमंडल पर शालीनता की उभरी हुई आभा. आकर्षक व्यक्तित्व, जो सहज ही मिलने-जुलने वालों पर प्रभाव डालने में समर्थ. संवेदनशील हृदय, जो किसी भी अन्याय-अत्याचार-पीड़ित के प्रति द्रवीभूत हो उठता था. (नीचे भी पढ़ें)
कला-साहित्य सेवकों तथा सहृदयों के निमित्त कुसम-सुकोमल और समाज-विरोधी भ्रष्टाचारियों के लिए बज्र-कठोर! कवि-हृदय, भावुक तथा कर्तव्यनिष्ठ लौह-लेखनी के पत्रकार. टाटा के लौह नगर जमशेदपुर में श्री गंगा प्रसाद कौशल का लोक-सेवी व्यक्तित्व मात्र आदर का ही पात्र नहीं था, वरन् था श्रद्धा-भक्ति से सम्मानित और नमस्कृत भी. किसी दुर्बल अत्याचार-पीडि़त के प्रति उचित न्याय की व्यवस्था, किसी भ्रष्टाचारी समाज-द्रोही के प्रति जेहाद का प्रबन्ध, किसी के झंझट-झगड़े के सुलझाव की धुन, किसी निराश्रय-असहाय की रक्षा-व्यवस्था की व्यस्तता और किसी बेरोजगार की रोजी-रोटी का मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास – कौशल जी की दिनचर्या का मुख्य कार्यक्रम बन गया था. (नीचे भी पढ़ें)
योग्य कलाकारों एवं विद्वानों का मान-सम्मान, तरुण पीढ़ी के साहित्य-शिल्पियों को सहृदयता-पूर्ण प्रोत्साहन तथा पत्रकारिता के मानदंड को किसी भी कीमत पर नहीं झुकने देने की वज्र अविचलता आदि मानवीय गुणों ने कौशल जी के व्यक्तित्व को बहुत ही ऊंचा उठा दिया था. (नीचे भी पढ़ें)
कौशल जी का सार्वजनिक जीवन इतना व्यस्त रहता था कि उन्हें अपने घर-परिवार की कौन कहे, अन ेक दिन भोजन तक की स्मृति नहीं रह पाती थी. मुझे तो जब भी उनसे मिलने का अवसर मिला, उनमें अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रतिमूर्ति के दर्शन हुए. (नीचे भी पढ़ें)
श्री कौशल से प्रथम साक्षात् का अवसर मुझे 1941ई में जमशेदपुर में प्राप्त हुआ. उन दिनों वे ‘मज़दूर आवाज‘ नामक साप्ताहिक पत्र का सम्पादन कर रहे थे. ‘मज़दूर आवाज’ का प्रकाशन अमर शहीद मौलाना प्रो अब्दुलबारी के संरक्षण में, जो उस काल टाटा के मज़दूरों के मसीहा तथा मज़दूर-यूनियन के शीर्ष नेता थे, मज़दूर हितों के रक्षार्थ हुआ था और मौलाना प्रो बारी साहब की प्रेरणा से ही कौशल जी ने पटना से जमशेदपुर जाकर ‘मज़दूर आवाज‘ का संपादन प्रभार संभाला था. जब मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई थी, उन दिनों ‘मज़दूर आवाज‘ को दैनिक करने की योजना बनाई जा रही थी, किन्तु अकाल ही मौलाना प्रोफेसर बारी साहब की हत्या हो जाने के कारण ‘मज़दूर आवाज’ का प्रकाशन बन्द हो गया. (नीचे भी पढ़ें)
इन पंक्तियों का लेखक उन दिनों बिहार सरकार द्वारा संचालित हिन्दी प्रचार योजना के अन्तर्गत सुहृद संघ-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, घाटशिला का संचालक था. सिंहभूम के लगभग सात वर्षों के प्रवास-काल में मुझे कौशल जी से मिलने-जुलने और उन्हें निकट से देखने का अनेक बार अवसर मिला. जब-जब मुझे उनसे साक्षात करने का अवसर मिला, मैंने उनमें एक प्रांजल प्रतिभा के कवि, साधनारत मनस्वी साहित्यकार तथा बहुश्रुत-कर्मठ पत्रकार की त्रिमूर्ति के समन्वित स्वरूप के दर्शन किए. उनका काव्य ‘वीर बालक‘ पुस्तक भंडार, पटना से प्रकाशित हो चुका था और उसकी प्रति हमारे घाटशिला स्थित कार्यालय के पुस्तकालय में उपलब्ध थी. ‘वीर बालक‘ को पढ़कर ही मुझे कौशल जी से मिलने की प्रेरणा हुई थी और जब मैं प्रथम बार उनसे ‘मज़दूर आवाज‘ कार्यालय में मिला तो इतना स्नेह और ममत्व उन्होंने दिया कि सदा के लिए अपना बना लिया. (नीचे भी पढ़ें)
‘मज़दूर आवाज‘ के बन्द हो जाने पर अपनी एकान्तनिष्ठा तथा कर्मठता पूर्ण कार्य कुशलता के द्वारा कौशल जी ने अपने कतिपय संपन्न सुहृदय सहयोगियों के सहयोग से जुगसलाई, जमशेदपुर में सन् 1951 ई में ‘आज़ाद प्रेस’ की स्थापना की और ‘आज़ाद मज़दूर‘ साप्ताहिक का मरहूम प्रो बारी साहब की स्मृति में संपादन-प्रकाशन प्रारंभ किया. वर्षों से ‘आज़ाद मज़दूर’ बिहार सरकार की स्वीकृत सूची में नहीं दर्ज किए जाने, तथा सरकारी विज्ञापनों के नहीं मिलने पर भी टाटा के मज़दूरों तथा कर्मचारियों के हित में, उनके उचित प्राप्य की प्राप्ति के लिए सतत संधर्षशील रहा है और स्थानीय जनता के अभाव-अभियोगों का निर्भीक प्रकाशन कर जनहित-साधन के निमित्त वातावरण को आन्दोलित करता रहा है. कौशल जी की निर्भीक पत्रकारिता की अवधि में मज़दूर-कर्मचारियों का पक्षधर होने के कारण, अनेक अवसर ऐसे आये जब टाटा कम्पनी के वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें विविध प्रलोभन के मूल्य पर खरीदना चाहा, किन्तु कौशल जी के लौह-पत्रकार ने अनेक असुविधाओं तथा परेशानियों का सामना करते हुए भी कभी पत्रकारिता के गौरव को झुकने नहीं दिया और अपनी लेखनी को मज़दूरों के उचित हितों के निमित्त सतत आज़ाद रखा. इस कारण बुर्जुआ नीति के पोषक कम्पनी के बड़े अधिकारी सतत कौशल जी से खार खाते ही रहे और इस लोकसेवी निर्भीक पत्रकार तथा कर्मठ समाजसेवी को टाटा कम्पनी ने विगत दो दशाब्दियों में पैर टिकाने तक की जगह नहीं प्रदान की. फिर भी अपने कर्म-कौशल के बल पर उन्होंने वहां अपनी एक कुटी का निर्माण कर ही लिया. तब भी उन्हें अनेक नागरिक सुविधाओं की उपलब्धि में सदा कठिनाई बनी रही. जानने वाले यह अच्छी तरह जानते हैं, किन्तु अपनी निजी सुविधाओं के लिए कभी कम्पनी के अधिकारियों तथा राजकीय पदाधिकारियों के सम्मुख उन्होंने जुबान नहीं हिलाई और न कभी अपने को उनका कृतज्ञ ही बनाया. (नीचे भी पढ़ें)
कौशल जी को अपनी निर्भीक लेखनी तथा स्वार्थ रहित सामाजिक सेवाओं पर दृढ़ विश्वास था और उसी आत्मविश्वास के बल पर वे अपने सार्वजनिक जीवन की कड़वी-मीठी अनुभूतियां संजोते रहे. जमशेदपुर जैसे विश्व प्रसिद्ध औद्योगिक नगर में कौशल जी जैसे प्रभावशाली पत्रकार ने यदि अपनी लेखनी का व्यापार किया होता तो जीवन में उन्हें सभी आधुनिक उपकरणों की उपलब्धि के साथ बड़े बंगले तथा ‘कार‘ की सुविधा तक प्राप्त रहती. किन्तु जो व्यक्ति स्वयं भ्रष्टाचारों के विरुद्ध दिन-रात खड्गहस्त रहा और दलित-उत्पीडि़त तथा शोषितों की सेवा ही जिसकी एकमात्र संपदा रही, उससे स्वयं के लिए भ्रष्टाचारियों की सहायता से अर्थोपार्जन की आशा कैसे की जाती? कौशल जी जन-जीवन के नेता थे और उन्हें जनता के बीच जन-साधारण के स्तर पर रहना ही सुखद और सन्तोषप्रद लगता था. (नीचे भी पढ़ें)
‘आज़ाद मज़दूर’ का सम्पादन, आज़ाद प्रेस की व्यवस्था, संचालन तथा सार्वजनिक विविध सेवा कार्यों में अहर्निश व्यस्त रहने के बावजूद अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के उपयोग का अवसर भी कौशल जी निकाल पाते थे, यह उन जैसे मनस्वी साधक का ही काम था. उनकी साहित्यिक उपलब्धियां भी महत्वपूर्ण हैं. इन बहुमुखी प्रतिभा के धनी सारस्वत साधक ने अनेक काव्य-संग्रह, काव्य, गीतिनाट्य, कहानी-संग्रह एवं उपन्यासादि राष्ट्र भारती के भंडार में समर्पित किये. ‘वीर बालक’ (काव्य) जिसे भारत सरकार ने पुरस्कृत किया, के अतिरिक्त ‘गोविन्द गुप्त‘ ‘नयन-नीर’, ‘सुषमा‘ आदि काव्य-पुस्तकें, ‘बच्चों के फूल’- बाल साहित्य, ‘नादिरा’, ‘नूरजहां’ – आदि ऐतिहासिक गीतिनाट्य, ‘राधा’, ‘बापू’, ‘बधाई’ काव्य ‘अन्तिम इच्छा’ – कथा संग्रह और ‘सुकेशिनी’ – उपन्यास आदि एक दर्जन पुस्तकें अपनी मौलिक कृति के रूप में कौशल जी ने हिन्दी-संसार को भेंट दीं. उन्होंने ‘एंडर्सन की कहानियां’ नाम से विश्व प्रसिद्ध कहानियों का संग्रह तथा ‘शबरी’ नामक अनुदित नाटिका भी साहित्य-जगत को समर्पित कर हिन्दी-भारती को समृद्ध बनाया. कविवर कौशल जी की पर्याप्त रचनाएं अभी अप्रकाशित हैं. (नीचे भी पढ़ें)
जहां तक साहित्य-सेवा का क्षेत्र है, श्री कौशल कथाकार तथा सुचिन्तनशील विचारक थे. किन्तु मूल रूप में वे जन्मजात कवि थे और साथ ही एक भावुक एवं रससिद्ध गीतकार भी. उनसे साहित्य और समाज को बड़ी आशाएं थीं, किन्तु मृत्यु पर कब किसका बस चला है. जो सत्य है, ध्रुव है, उसे ज्ञानियों ने सोचनीय नहीं बतलाया है, किन्तु सांसारिक प्राणियों के लिए तो हर्ष, संताप आदि मनोविकार अनिवार्य हैं. कौशल जी के अभाव में जमशेदपुर के जन-जीवन में जो रिक्तता आई है उसकी पूर्ति युगों तक सम्भव नहीं होगी.



