जमशेदपुर : एक करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के आरोपी जमशेदपुर के मानगो स्थित एलीट हॉस्पीटल (अब उमा अस्पताल) के चार डायरेक्टरों डिमना रोड मधुसूदन श्रीकृष्णपुरी निवासी सच्चिदानंद प्रसाद, सुरेश प्रसाद, नोवामुंडी निवासी संजय प्रसाद एवं विजय प्रसाद के खिलाफ जमशेदपुर कोर्ट के प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी श्री आलोक की अदालत से चार आरोपियों की गिरफ्तारी का वारंट जारी हुआ था. आरोपियों ने अग्रिम जमानत की याचिका दाखिल की थी, जिसकी सुनवाई एडीजे 1 कुमार दिनेश के यहां हो रही थी. आरोपियों ने अदालत में मध्यस्थता के लिए कहा, जिसे वादी डॉ संतोष गुप्ता ने मान लिया था. चार बार मध्यस्थता के लिए बैठक हुई लेकिन आरोपियों ने अंत में मध्यस्थता से इंकार कर दिया. इसके बाद आरोपियों की अग्रिम जमानत की याचिका की एडीजे 1 की अदालत में पुनः सुनवाई शुरू हुई. बाद में एडीजे 1 के अवकाश के जाने के कारण मामले की सुनवाई एडीजे 3 आभास वर्मा की अदालत में 23 अप्रैल को सुनवाई हुई थी और फैसला सुरक्षित रख लिया गया था. मंगलवार को एडीजे 3 आभास वर्मा ने सभी आरोपियों की अग्रिम जमानत की याचिका को खारिज कर दी. इस मामले में उलीडीह थाने में 2 अगस्त, 2019 को आईपीसी की धारा 420, 406, 120 बी के तहत एफआईआर दर्ज किया गया था. मामले के अनुसंधानकर्ता उलीडीह थानेदार मेघनाथ मंडल और पर्यवेक्षण अधिकारी तत्कालीन पुलिस अधीक्षक सुभाषचंद जाट ने मामले को सत्य पाया था. अब चूंकि इस मामले में आरोपियों की जमानत याचिका खारिज हो चुकी है, इस कारण अब या तो उनको रेगुलर बेल लेना होगा या फिर जेल जाना होगा. हालांकि, इस मामले में खुद कोर्ट की बातों को ही दरकिनार कर दिया गया है, जिस कारण मामला बड़ा होता नजर आ रहा है. शिकायतकर्ता डॉ संतोष गुप्ता की ओर से केस में पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता प्रकाश झा ने किया. (नीचे देखे क्या है पूरा मामला)

पूरा मामला इस प्रकार है : वाकया 2016 का है. डॉ संतोष गुप्ता ब्रह्मानंद अस्पताल, तामोलिया में हृदय रोग विशेषज्ञ हैं. जुलाई, 2016 में डॉ गुप्ता ब्रह्मानंद अस्पताल से मिलने डिमना रोड निवासी सच्चिदानंद प्रसाद और सुरेश प्रसाद आए और उन्होंने कहा कि उनके अस्पताल की माली हालत ठीक नहीं है और उनसे अस्पताल में निवेश करने का आग्रह किया. इसके एवज में उन्होंने डॉ गुप्ता से वादा किया कि वे अस्पताल को 18 साल की लीज पर उन्हें दे देंगे. डॉ गुप्ता अस्पताल देखने गए वहां एलिट अस्पताल से सभी डायरेक्टर सच्चिदानंद प्रसाद, सुरेश प्रसाद, संजय प्रसाद और विजय अस्पताल लेने का पुनः आग्रह किया. डॉ संतोष गुप्ता ने उन दोनों की बातों पर यकीन करते हुए अस्पताल में रंग रोगन सहित मरम्मती के सभी कार्य शुरू करवा दिया. डायरेक्टरों के कहने पर पहले 1 लाख 11 हजार, फिर 2 लाख 50 हजार दिया जो कर्मचारियों के लंबित वेतन और बकाया बिजली बिल के लिए भुगतान किया था. इसके बाद मेडिकल इक्विपमेंट, सेंट्रल एसी, लाइट, पार्किंग व्यवस्था, फायर सिस्टम, थिएटर, एम्बुलेंस, फर्नीचर आदि पर करीब 70 लाख रुपये डॉ गुप्ता ने खर्च किए. लेकिन बाद में डॉ गुप्ता को पता चला कि आरोपियों ने अस्पताल के बेसमेंट और प्रथम तल्ला को गिरवी रखकर 3.50 करोड़ रुपये का लोन लिया है, जिसका ईएमआई नही दिया जा रहा था. इस कारण लोन एनपीए होने वाला था. इसके बाद डॉ संतोष ने आरोपियों के आग्रह पर एनपीए से बचाने के लिए 30 सितंबर, 2016 को 25 लाख रुपये भी दिए. सोची समझी साजिश के तहत आरोपियों ने 13 दिसंबर, 2016 को आरोपियों ने डॉ गुप्ता को एलाइट अस्पताल का डायरेक्टर बना दिया. लेकिन इसके बाद 25 दिसंबर, 2016 को डॉ गुप्ता को पता चला कि आरोपि सच्चिदानंद प्रसाद एवं उनके भाइयों ने अस्पताल और अपने एक अन्य दूसरे फर्म (सुखचैन इंडस्ट्री) के नाम पर अस्पताल के विभिन्न तल्लो को गिरवी रखकर अलग-अलग बैंकों से 1.25 करोड़ रुपये तथा 5.5 करोड़ रुपये का लोन लिया था जो एनपीए (नॉन परफार्मिंग एसेट) हो चुका था. इसके बाद 29 दिसंबर, 2016 को डॉ संतोष गुप्ता ने डायरेक्टर के पद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद अस्पताल के एक अन्य डायरेक्टर डॉ दिलीप ने डॉ संतोष गुप्ता से कहा कि वह एलिट हॉस्पिटल के असली मालिक है और अब इस अस्पताल को चलाना चाहते है. उन्होंने डॉ गुप्ता के सारे खर्च किए सारे पैसे करीब एक करोड़ वापस करने का वादा किया. लेकिन यह आश्वासन कोरा ही रहा. अंतत: 2 अगस्त, 2019 को डॉ गुप्ता ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करा दी.






