
रांची : झारखंड सरकार कुड़मी जाति को आदिवासी सूची में शामिल करने जा रही हैं. इसकी तैयारी शुरू कर दी गयी है. इस वर्ग में पिछड़े वर्गो की जाति को राज्य में आदिवासियों की तरह उन्हे भी विशेष दर्जा दिलाने के लिए सरकार के साथ मिलकर मंतव्य तैयार किया जा रहा है. इस मामले में राज्य सरकार की ओर से राज्य पिछड़ा आयोग से मंतव्य मांगा गया हैं. इस पर विचार करते हुए सरकार वर्ष 1913 व 1931 में केंद्र की ओर से बनाए गये प्रावधानो पर भी प्रकाश डालेगी. इस पर राज्यों से कुड़मी जाति की अधिसूचना जारी कर उसे सरकार के समक्ष पेश किया जायेगा. आयोग की अनुशंसा के बाद इस पर राज्य सरकार केंद्र को अनुशंसा भेजने पर विचार करेगी. बता दे, कि राज्य में कुल 70 लाख कुड़मी की आबादी है. दक्षिण छोटानागपुर, उत्तरी छोटानागपुर व कोल्हान इलाके में इनकी बड़ी आबादी है. इसकी पहचान कुड़मी जाति की परंपरा, संस्कृति, लोक- मान्यताओं, रहन-सहन व गोत्र संबंधित इसकी परीक्षण की जायेगी. इस पर न्यायमूर्ति जस्टिस लोकनाथ प्रसाद ने इस बारे में बताया कि कुड़मी को आदिवासी सूची में शामिल करने के बारे में मंतव्य मांगा गया है. इस पर प्रकिया शुरू होने से पहले उन्होने र्शीष स्तर पर सहमती मांगी हैं. अनुमति मिलने के बाद इस कार्य को आगे बढ़ाया जायेगा. आपको बता दें कि इससे पहले जब अर्जुन मुंडा की सरकार झारखंड में थी, तब भी कुड़मी समाज को आदिवासी का दर्जा देने के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय को अनुशंसा भेजी थी. यह मसला राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के पास पहुंचा, जिसके बाद यह अनुशंसा वापस दिल्ली से रांची के जनजातीय शोध संस्थान तक आया. जनजातीय शोध संस्थान ने अपनी अ़ुशंसा में कुड़मी को अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासी का दर्जा देने से इनकार कर दिया. इसके बाद मामला विधानसभा में उठा. चूंकि, विधानसभा से पारित कराकर केंद्र सरकार के पास इसको भेजा गया था, इस कारण फिर से विधानसभा में मामले को लाया गया तब भाजपा के विधायक रहते हुए सरयू राय ने सदन में सरकार की ओर से यह बातें रखी थी कि कुड़मी को फिर से भारत सरकार के पास अनुशंसा की जायेगी. लेकिन फिर मामला ठंडे बस्ते में चला गया. अब एक बार फिर से झारखंड की हेमंत सोरेन की सरकार इस ओर कदम बढ़ाने की तैयारी कर रही है. वैसे इस मामले को लेकर झारखंड के 42 विधायक और दो सांसदों ने सत्ता पक्ष और विपक्ष की दीवार तोड़ते हुए सरकार प र दबाव भी बनाया था कि कुड़मी जाति का दर्जा दिया जाये, लेकिन वह मांग अधूरी ही रह गयी.
क्या है कुड़मी समुदाय की दलील, क्यों है आदिवासी समुदाय का विरोध, क्या है राजनीतिक मायने
कुड़मी समुदाय का जोर है कि वर्ष 1931 तक कुड़मी/कुर्मी समाज आदिवासी की ही सूची में शामिल थे, जिसको बाद में हटा दिया गया था. वे लोग अपना अधिकारी और हक वापस चाहते है. कुड़मी समुदाय की दलील है कि सीएनटी एक्ट में उनको शामिल किया गया है, जिस कारण वे लोग उसी तरह रहते है, जिस तरह आदिवासी समुदाय पर कानून है. ऐसे में उनको आदिवासी का दर्जा क्यों नहीं दिया जा सकता है. आपको बता दें कि झारखंड में पूरी आबादी का 16 फीसदी आबादी कुड़मी समुदाय की है और राजनीतिक और सामाजिक तौर पर ताकतवार माने जाते है. आपको बता दें कि कुड़मी समुदाय के काफी विधायक झारखंड विधानसभा में है जबकि लोकसभा की 14 सीटों में भाजपा के सांसद विद्युत वरण महतो समेत अन्य कुड़मी नेता भी सांसद है. खुद चंद्रप्रकाश चौधरी आजसू है, जो कुड़मी समुदाय को आदिवासी में शामिल करने की वकालत कर चुके है. वैसे कुड़मी समाज को आदिवासी में शामिल करने का विवाद काफी पुराना है. आदिवासी समुदाय कुड़मी समाज को शामिल करने का विरोध करते रहे है. उनका मानना है कि जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण का लाभ लेने के लिए कुड़मियों की नजर है. आपको बता दें कि आदिवासी समुदाय को 26 फीसदी आरक्षण है जबकि कुड़मी समुदाय के लोगों को 14 फीसदी आरक्षण है, जो पिछड़ा वर्ग में शामिल है. आदिवासी समुदाय के नेताओं का कहना है कि वे लोग सरना धर्म कोड की मांग करते है, जिससे उनकी अलग पहचान जनगणना में हो सके जबकि कुड़मी समुदाय ऐसी मांग तक नहीं करता है.





