
जमशेदपुर: झारखंड में राज्यसभा चुनाव हो चुका है. एक सीट पर यूपीए (झामुमो के गुरुजी शिबू सोरेन) तो एक पर एनडीए (भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश) ने बाजी मारी है. एनडीए ने झामुमो और कांग्रेस को बता दिया है कि भले ही चुनाव के समय जनता ने अनदेखी की लेकिन रणनीति आज भी भाजपा और घटक दलों की ही चलती है. राज्यसभा चुनाव में एनडीए प्रत्याशी को मिले वोटों की संख्या से जहां नेताओं में उत्साह है वही यूपीए के नेता बैकफुट पर आ गए है. यूपीए खेमे के दो घटक दल जैसे कांग्रेस व झामुमो है, जिसमें झामुमो के प्रत्याशी शिबू सोरेन को दीपक प्रकाश से ज्यादा वोट मिलने चाहिए जैसा की यूपीए का आंकड़ा दिख रहा था. लेकिन वोटों की गिनती के बाद एनडीए प्रत्याशी दीपक प्रकाश के पक्ष में 31 मत मिलना गले से उतर नही रहा है. पहले से कयास लगाए जा रहे थे कि भाजपा के 26 वोट, आजसू के 02, निर्दलीय सरयू राय व अमित यादव के वोट कुल मिलाकर 30 का आंकडा़ हो रहा था लेकिन चुनाव के बाद 31 पहुंच जाना लोगों को चौंका दिया. खुद सरकार में शामिल यूपीए के विधायकों और नेताओं को भी यह चौंका गया. आखिर यूपीए के अंदरखाने में किसने दगाबाजी की, इसको लेकर जरूर सवाल उठे. यूपीए में रहकर एनडीए प्रत्याशी के समर्थन में वोट किसने किया. क्या झारखंड की राजनीति में आने वाले दिनों में हलचल हो सकती है. शिबू सोरेन को 30 वोट मिले, जिसमें उनके 29 अपने विधायक और एक राजद का वोट का मिलाकर 30 हो गया. कांग्रेस को 19 वोट (कांग्रेस का अपना 15, निर्दलीय बंधु तिर्की और प्रदीप यादव, माले के विधायक बिनोद सिंह और एनसीपी के विधायक कमलेश सिंह शामिल है) मिलने का आसार था लेकिन उसे 18 वोट ही मिला. इसके लिए यूपीए के नेताओं का कहना है कि इसकी समीक्षा की जाएगी. चुनाव से पूर्व यूपीए व एनडीए के नेताओं ने अलग-अलग बैठक कर अपने प्रत्याशी को जिताने की अपील की थी लेकिन परिणाम अनुकूल नहीं रहा. ऐसे में आखिर कांग्रेस का उम्मीदवार उतार देना किस बात की ओर संकेत करता है ? क्या कांग्रेस झामुमो को यह बताना चाहती है कि वो झारखंड में उससे कम नहीं ? सवाल यहां यह है कि हार के लिए आखिर क्यों कांग्रेस ने ऐसे उम्मीदवार को उतारा जिसे हारने का कोई गम ही नहीं हो. राज्यसभा चुनाव में एनडीए के पक्ष में वोट देने का आरोप कमलेश सिंह पर लग रहा हैं. बताया जा रहा है कि उन्होंने भाजपा के पक्ष में वोट किया है. लेकिन कुछ जानकार प्रदीप यादव पर भी सवाल उठा रहे हैं. कहना यहां मुश्किल है कि भाजपा का कौन सगा और कौन यूपीए का सौतेला निकला. लेकिन कुल मिलाकर भाजपा ने जेएमएम और कांग्रेस को बता दिया है कि भले ही जनता के चुनाव में वो कम पड़े हों, लेकिन रणनीति आज भी उन्हीं की चलती है.






