जमशेदपुर : राष्ट्रीय कम्पनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) कोलकाता में न्यायिक सदस्य रोहित कपूर एंव तकनीकी सदस्य बलराज जोशी की पीठ में टाटा स्टील की कंपनी टायो के मजदूरों द्वारा दायर पीटीशन सीपी (आईबी) नंबर 701/2017 और आईए नंबर 33/2020 के तहत कामगारों के 190 करोड़ के दावे और रिजोल्यूशन प्रोफेशनल द्वारा कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स को गैरकानूनी ढंग से गठित कर मजदूरों के वोटिंग अधिकार को घटाने और झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड के वोटिंग अधिकार को बढ़ाने के मसलों पर सुनवाई हुई. मजदूरों के अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव ने अदालत को बताया कि मजदूरों ने अपने पीटीशन में पहले 24 करोड़ का दावा किया जिसे एनसीएलटी की बेंच ने स्वीकृत किया लेकिन पहले रिजोल्यूशन प्रोफेशनल विनिता अग्रवाल ने उसे घटाकर 20 करोड़ कर दिया ताकि मजदूरों का वीटो का अधिकार कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स में न रहे ताकि टाटा स्टील का कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स पर अपरोक्ष कब्जा बना रहे. (नीचे भी पढ़ें)
उन्होंने आगे बताया कि नये रिजोल्यूशन प्रोफेशनल शशि अग्रवाल ने अपनी नियुक्ति के तुरंत बाद झारखंड बिजली वितरण निगल लिमिटेड का दावा बढ़ाकर 366 करोड़ रूपये कर दिया और झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड का वोटिंग अधिकार 90 फीसदी से अधिक कर दिया और मजदूरों का वोटिंग अधिकार 32 फीसदी से घटा कर 7 फीसदी कर दिया और इस प्रकार मजदूरों को लगभग कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स से बाहर का रास्ता दिखा दिया. उन्होंने सवाल करते हुए आगे बताया कि झारखंड बिजली वितरण निगम का दावा 24 साल पुराना है, जो मसला उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय तक गया तब यह तीन साल से पुराना दावा रिजोल्यूशन प्रोफेशनल ने कैसे मंजूर किया? उन्होंने आगे बताया कि झारखंड बिजली वितरण निगम का दावा टायो कंपनी ने आकस्मिक देयताएं के रूप में दिखाया है, जिसका मूल्यांकन कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया विनियमन 14 तहत होता है, जिसे रिजोल्यूशन प्रोफेशनल शशि अग्रवाल ने नहीं कराया है और फर्जीवाड़ा कर कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स को झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड के कब्जे में करा दिया. (नीचे भी पढ़ें)
उन्होंने आगे कहा कि मजदूरों का दावा 190 करोड़ का है और यह औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 25 ओ के तहत किया गया है जिसे रिजोल्यूशन प्रोफेशनल बदल नहीं सकता. इस कारण कामगारों का दावा न केवल कानूनी तौर पर उचित है बल्कि कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स में उसका वोटिंग अधिकार सबसे ज्यादा है. उन्होंने कहा कि रिजोल्यूशन प्रोफेशनल के फर्जीवाड़े के कारण कोई अच्छी कंपनी इसका अधिग्रहण करने एनसीएलटी में नहीं आई क्योंकि टाटा टायो की 350 एकड़ जमीन पर अपना कब्जा चाहती है और टायो का फर्जी तरीके से परिसमापन करना चाहती है. उन्होंने आगे बताया कि रिजोल्यूशन प्रोफेशनल शशि अग्रवाल अब तक टाटा स्टील और झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड के एजेंट के तौर पर काम करता रहा है. (नीचे भी पढ़ें)
उन्होंने उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का हवाला देते हुए माननीय एनसीएलटी को बताया कि वास्तव में झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड का कोई दावा टायो कंपनी पर बनता ही नहीं है. टायो के जमीन की तथाकथित लीज का मसला उठाते हुए अखिलेश श्रीवास्तव ने एनसीएलटी को बताया कि यह जमीन लीज नहीं है यह सरकारी अनुदान है जिसे बिहार सरकार ने 1969 में टाटा स्टील को दिया था. टाटा स्टील ने एक संयुक्त उपक्रम के तहत टायो कंपनी (टाटा योदोगावा) जापान की एक कंपनी योदोगावा के सहयोग से लगाई और इसके चलते सरकारी अनुदान के प्रावधानों के तहत उक्त जमीन का मालिकाना हक टायो के पास आ गया. उन्होंने कहा कि 2016 तक कंपनी चली और टायो के वित्तीय वर्ष 2016/17 के खाता-बही में दोषपूर्ण तरीके से नुक्सान को फर्जी तरीके से बढ़ाकर टाटा स्टील ने टायो को गैरकानूनी तरीके बंद कर दिया. अगली सुनवाई 20 जनवरी .2023 को होगी. अखिलेश श्रीवास्तव अपनी बहस जारी रखेंगे. कामगारों की पैरवी अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव एवं रमेश कुशवाहा, चार्टर्ड अकाउंटेंट ने की.



