
जमशेदपुर : वर्ष 1882 में जमशेदजी नसेरवानजी टाटा ने एक जर्मन भूविज्ञानी वॉन श्वार्ज द्वारा ’’रिपोर्ट ऑन द फाइनेंशियल प्रॉस्पेक्ट ऑफ आयरन-वर्किंग पद द चंदा डिस्ट्रिक्ट’’ शीर्षक से एक रिपोर्ट देखी, जिसमें कहा गया था कि चंदा जिले के लोहरा में लौह अयस्क के बहुत अहम और सबसे बेहतरीन भंडार हैं और वरोरा जिले के पास कोयला है. लेकिन परीक्षण के बाद यहां का कोयला अनुपयुक्त पाया गया. सरकार द्वारा दी जाने वाली उत्खनन की शर्तें बहुत अधिक प्रतिबंधात्मक थीं, इसलिए, इसमें से कुछ भी नहीं निकला, लेकिन 1899 में एक रिपोर्ट ने सब कुछ बदल दिया. 1899 में ब्रिटिश इंडियन आर्मी के एक अधिकारी मेजर महोन ने सिफारिश की कि भारत में स्टील उद्योग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. इसके बाद भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने तत्काल खनिज रियायत नीति को उदार बनाया. जमशेदजी नसरवानजी टाटा के लिए भारत को अपना पहला स्टील प्लांट देने का यह एक सुनहरा अवसर था. वर्ष 1900 में, जमशेदजी इंग्लैंड गए और सेक्रेट्री ऑफ स्टेट फॉर इंडिया लॉर्ड जॉर्ज हैमिल्टन से मिले, जो भारत के स्टील उत्पादक राष्ट्र बनने की संभावना को देखकर खुश थे. टाटा को चंदा जिला के अयस्क के लिए 15 नवंबर, 1902 को प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस प्राप्त हुआ था, लेकिन अयस्क की गुणवत्ता का अध्ययन करने के बाद यह स्टील बनाने के लिए अनुपयुक्त पाया गया.



