जमशेदपुर: जमशेदपुर के दलमा क्षेत्र ग्राम सभा सुरक्षा मंच (कोल्हान) के नेतृत्व में मंगलवार को उपायुक्त कार्यालय जमशेदपुर के समक्ष एक ऐतिहासिक जनविरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया. यह प्रदर्शन दलमा को इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित करने के नाम पर आदिवासी और अन्य परंपरागत वननिवासी परिवारों को उजाड़ने, उनके पारंपरिक निवासों को ध्वस्त करने और वनाधिकार को दरकिनार करने की सरकारी साजिशों के खिलाफ था. पटमदा, चांडिल, बोड़ाम, डिमना, पारडीह, गालूडीह, घाटशिला, मुसाबनी सहित कोल्हान के दूर-दराज के क्षेत्रों से हज़ारों की संख्या में ग्रामीण आमबगान मैदान में एकत्र हुए. वहां से सभी प्रदर्शनकारी नारे लगाते हुए रैली के रूप में पैदल मार्च करते हुए उपायुक्त कार्यालय पहुंचे. इस रैली की विशेषता रही महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी. बड़ी संख्या में महिलाएं अपने हाथों में नारे और मांगों से लिखे हुए बैनर लेकर आई थीं, जिनमें लिखा था –
“हम वनवासी हैं, बेघर नहीं होंगे!”
“हम उजाड़े नहीं जाएंगे – जंगल हमारा है!” (नीचे भी पढ़ें)
महिलाओं के नारों और चेहरों पर दशकों का दर्द और अधिकारों के लिए खड़ा होने की चेतना साफ़ झलक रही थी. रैली के दौरान गूंजते नारों ने माहौल को आंदोलित कर दिया:
“वन अधिकार कानून का बहाना बंद करो!”
“इको-सेंसिटिव जोन के नाम पर उजाड़ना बंद करो!”
“वन क्षेत्र में रह रहे लोगों को सामुदायिक और व्यक्तिगत वन पट्टा दो!” (नीचे भी पढ़ें)
प्रदर्शन के दौरान उपस्थित ग्रामीणों ने वन विभाग पर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि जब वे बरसों से रह रहे वन भूमि पर व्यक्तिगत पट्टा के लिए आवेदन करते हैं, तो उन्हें उसी जमीन का पट्टा नहीं दिया जाता जिस पर वे वास्तव में रहते हैं. इसके बजाय उन्हें बार-बार इधर-उधर दौड़ाया जाता है, और मांगी गई ज़मीन का एक प्रतिशत हिस्सा भी नहीं दिया जाता. उपस्थित वक्ताओं ने भावुक होकर कहा “हम लोग इसी जंगल में पैदा हुए हैं. हमारे पिताजी भी इसी जंगल में रहे. उनके पिताजी और उनके पिताजी के पिताजी को भी इसी जंगल ने बड़ा किया. अब वन विभाग हमसे उसी जमीन के लिए कागज़ मांग रही है, जो हमारी पुश्तैनी ज़मीन है, हमारा घर है.”
यह सवाल सिर्फ कागज का नहीं, बल्कि अस्तित्व और पहचान का है. (नीचे भी पढ़ें)
यह प्रदर्शन केवल विरोध नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन और जीवन की रक्षा के लिए आदिवासी समाज की संगठित चेतना और लोकतांत्रिक प्रतिरोध का प्रतीक बनकर उभरा. उनकी प्रमुख मांगों में “इको-सेंसिटिव जोन” के नाम पर पारंपरिक निवासों को ध्वस्त करने की कार्रवाई को तुरंत रोका जाए, प्रत्येक प्रभावित ग्रामसभा की पूर्व सहमति के बिना कोई भी निर्णय या कार्रवाई न की जाए, वन अधिकार अधिनियम 2006 (एफआरए) के तहत अधिकारों की अधिस्वीकृति की प्रक्रिया को पारदर्शिता से पूरा किया जाए, विस्थापन नहीं, स्थायी परंपरागत अधिकारों की गारंटी दी जाए, पूरे मामले की न्यायिक जांच कराई जाए और जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई करने की मांग की गयी है.




